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श्रीकृष्ण आठवीं संतान के रूप में ही क्यों जन्मे? जानिए इसके पीछे छिपा अद्भुत रहस्य

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सनातन धर्म में कोई भी घटना बिना किसी कारण के घटित नहीं होती है। कोई भी अवतार संयोग से अवतरित नहीं होता, यहां तक कि देवकी के आठवें पुत्र के रूप में श्रीकृष्ण का जन्म क्रम भी कोई अचानक होने वाली घटना का हिस्सा नहीं है। यह ईश्वरीय योजना है, लेकिन कृष्ण आठवीं ही संतान के रूप में क्यों जन्में? पहली संतान क्यों नहीं, ताकि 6 निर्दोष बच्चों की जान बच सकें?

भगवत पुराण के अनुसार, यदि कृष्ण पहले जन्म लेते तो कंस के अत्याचार सामने नहीं आ पाते। बुराई को समाप्त करने से पहले उन्हें खुद को प्रकट करना पड़ता है। कृष्ण के 6 बड़े भाई, जो जन्म के समय ही मारे गए थे, सिर्फ निर्दोष शिशु नहीं थे। वे काल नेमी के पुनर्जन्मित पुत्र थे, जिन्हें ऋषि हिरण्यकशिपु ने श्राप दिया था कि, वे भविष्य में जन्म लेंगे और अपने पिता द्वारा मारे जाएंगे।

पहले क्यों नहीं लिया श्रीकृष्ण ने जन्म

उनकी मौत अतीत के कर्मों से मुक्ति थी। धर्म कभी भी व्यर्थ कष्टों को अनुमति नहीं देती है। कृष्ण ने उनके बाद आने का चुनाव करके कर्मों को खुद हल होने का मौका दिया। जन्म लेने में होने वाली देरी करुणा का ही एक छिपा हुआ रूप था, जिसने एक नए दिव्य युग के प्रारंभ होने से पहले अतीत के पापों को नष्ट होने का मौका प्रदान किया।

हिंदू ब्रह्मांड में संख्याओं में कंपन छिपा हुआ है। संख्या आठ खासतौर से महत्वपूर्ण मानी जाती है।

  • अष्ट लक्ष्मी- समृद्धि के आठ रूप
  • अष्ट सिद्धियां- आठ दिव्य शक्तियां
  • अष्टांग योग- मुक्ति का अष्टांग मार्ग
  • अष्ट दिगपाल- आठों दिशाों के संरक्षक

हिंदू शास्त्रों में अंक 8 को खासतौर से शुभ माना जाता है। पूर्ण अवतार कृष्ण संसार के चक्रों को जारी रखने नहीं आए थे, बल्कि उन्हें पुनर्स्थापित करने के लिए आए थे। सिर्फ आठवां अंक ही इस भार को वहन कर सकता था।

श्रीकृष्ण कब प्रकट होते हैं? अगर श्रीकृष्ण का जन्म सबसे अंत में हुआ होता, तो इसका मतलब यह होता कि, कंस आखिर में निर्विरोध शासन करता। लेकिन कृष्ण निर्णायक मोड़ से ठीक पहले यानी कंस के कगार पर आए। वे तब आए जब आस्था दम तोड़ रही थी, लेकिन पूरी तरह समाप्त नहीं हुई थी, जब हर ओर डर का साया था, लेकिन उसने लोगों को पूरी तरह से प्रभावित नहीं किया था। वे समय पर आए क्योंकि श्रीकृष्ण यही दर्शाते हैं।

महाभारत में श्रीकृष्ण कहते हैं कि, मैं तब प्रकट होता हूं, जब धर्म का पतन होता है। उसके खो जाने के बाद नहीं। लोगों को उसकी जरूरत महसूस होने से पहले नहीं, बल्कि उस नाजुक पल में जब दुनिया एक पतली सी डोर पर टिकी होती है और फिर भी उसे बचाना जरूरी होता है। कृष्ण न पहले आए और न ही आखिरी में आने का इंतजार किया। वह सही समय पर आए , जैसे धर्म हमेशा आता है।

विष्णु पुराण में कहा गया है कि, “यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर् भवति भरत, अभ्युत्थानं अधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्।”जब भी धर्म का पतन होता है, मैं खुद प्रकट होता हूं। इसलिए याद रखें कि अपने व्यक्तिगत जीवन में भी, जब भी पहले प्रयास में विफल हो जाते हैं और आशा टूटने लगती है… तो डरने की जरूरत नहीं है। चीजें न पहले होगी और न ही बाद जब उचित समय आए गया तब आपको काम में सफलता मिलेगी।

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