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Bilaspur High Court: सड़क दुर्घटना मामले में मुआवजा बढ़ाकर 14.72 लाख, बीमा कंपनी की अपील खारिज

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बिलासपुर :  छत्तीसगढ़ बिलासपुर हाई कोर्ट ने सड़क दुर्घटना में मारे गए एक व्यक्ति के परिजनों को बड़ी राहत दी है। जस्टिस संजय के. अग्रवाल के सिंगल बेंच ने ओरिएंटल इंश्योरेंस कंपनी की उस अपील को खारिज कर दिया, जिसमें कंपनी ने हर्जाना देने से बचने की गुहार लगाई थी। हाई कोर्ट ने पीड़ित परिवार की याचिका को स्वीकार करते हुए मुआवजे की राशि को साढ़े 10 लाख रुपये से बढ़ाकर 14 लाख 72 हजार 90 रुपये का भुगतान करने का आदेश बीमा कंपनी को दिया है। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा है, बीमा कंपनी केवल दावों के आधार पर अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकती, जब तक कि वह नियमों के उल्लंघन का कोई पुख्ता सबूत कोर्ट में पेश न करे।

पढ़िए क्या है मामला?

मामला जशपुर जिले के बगीचा थाना क्षेत्र के ग्राम फुलडीह का है। सड़क दुर्घटना में देवेंद्र कुमार की मौत हो गई थी। मृतक अपने पीछे पत्नी अनीता (37 वर्ष), 10 वर्षीय बेटा प्रेमकुमार और 3 वर्षीय मासूम बेटी मोनिका को छोड़ गया था।

मामले की सुनवाई के बाद जशपुर के मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण ने 17 अक्टूबर 2017 को पीड़ित परिवार के पक्ष में फैसला सुनाते हुए साढ़े 10 लाख का मुआवजा तय करते हुए पीड़ित परिवार को मुआवजा राशि का भुगतान करने का निर्देश ओरिएंटल इंश्योरेंस कंपनी को दिया था।

ट्रिब्यूनल के फैसले को बीमा कंपनी ने हाई कोर्ट में दी चुनाैती

दावा अधिकरण के फैसले को चुनौती देते हुए बीमा कंपनी ने छत्तीसगढ़ बिलासपुर हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी। बीमा कंपनी के अधिवक्ता ने कोर्ट को बताया, मृतक ने वाहन मालिक से गाड़ी उधार ली थी और इंश्योरेंस पॉलिसी की शर्तों का उल्लंघन किया था, लिहाजा क्षतिपूर्ति मुआवजा के लिए बीमा कंपनी जिम्मेदार नहीं है। पीड़ित परिवार की ओर से अधिवक्ता ने कहा, अधिकरण द्वारा तय किया गया मुआवजा कम है, इसे बढ़ाने की मांग की।

बीमा कंपनी के रूख पर कोर्ट ने जताई नाराजगी

याचिका की सुनवाई जस्टिस संजय के. अग्रवाल के सिंगल बेंच में हुई। कोर्ट ने बीमा कंपनी के रूख को लेकर नाराजगी जताई।कोर्ट ने कहा, बीमा कंपनी ने यह दलील तो दी है, वाहन को पॉलिसी की शर्तों के विपरीत चलाया जा रहा था, लेकिन इस उल्लंघन को साबित करने के लिए कोर्ट के समक्ष कोई भी पुख्ता सबूत पेश नहीं की। कोर्ट ने साफ कहा, बिना साक्ष्य के जिम्मेदारी से मुक्त होने का दावा स्वीकार नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने बीमा कंपनी की याचिका को खारिज करते हुए अधिकरण के फैसले को सही ठहराया।

 बढ़ी हुई राशि, ट्रिब्यूनल में करानी होगी जमा, ब्याज भी देना होगा

हाईकोर्ट ने न्यूनतम मजदूरी दरों और भविष्य की संभावनाओं को ध्यान में रखते हुए मुआवजे की राशि का दोबारा पुनर्गठन किया। मासिक आय का गणना, भविष्य की संभावनाएं, वार्षिक आय की गणना के आधार पर मुआवजा राशि तय करते हुए हाई कोर्ट ने अधिकरण द्वारा तय किए मुआवजा राशि में वृद्धि करते हुए, 7.5 प्रतिशत ब्याज के साथ 14 लाख 72 हजार 90 रुपये का भुगतान करने का निर्देश बीमा कंपनी को दिया है, बीमा कंपनी को यह राशि ट्रिब्यूनल में जमा करानी होगी। इसके लिए इंश्योरेंस कंपनी को हाई कोर्ट ने 45 दिनों का समय दिया है।

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