अगर आपने महाभारत देखी, सुनी या पढ़ी है, तो आपको इस महाकाव्य से जुड़ा अहम पात्र विदुर का नाम पता होगा। महात्मा विदुर महाभारत के लोकप्रिय पात्रों श्रीकृष्ण, अर्जुन, युधिष्ठिर, गुरु द्रोण, दुर्योधन और भीम आदि में से एक है। विदुर जो कौरवों और पांडवों को काका के साथ कुरुवंश के प्रधानमंत्री भी थे। महाभारत काल में विदुर विद्वान और दूरदर्शी व्यक्ति थे।
प्राचीन काल में महापुरुषों की वाणी आज नीतियों के रूप में काफी प्रचलित है। चाणक्य नीति की ही तरह लोग विदुर नीति का भी अनुसरण करते हैं। विदुर निति में जीवन-युद्ध, प्रेम, जीवन-व्यवहार की नीति के बारे में बताया गया है।
विदुर नीति के 6 दोषपूरी महाभारत के दौरान महात्मा विदुर की बातों को जितना नजरअंदाज किया गया, उतना किसी पात्र को नहीं किया गया। लेकिन आज के समय में भी विदुर नीति इतनी सटीक है कि, अगर कोई व्यक्ति इसका अनुसरण करता है, तो उसके जीवन में काफी बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं।
विदुर नीति में ऐसे 6 दोषों का जिक्र किया गया है, जो इंसान को अंदर से खोखला कर देते हैं। आइए जानते हैं कौन-से हैं वो दोष जिससे बचने की सलाह महात्मा विदुर अपनी विदुर नीति में बताते हैं।
पहला दोष नींदइस जगत में प्रत्येक प्राणी को नींद लेना जरूरी है, लेकिन एक तय समय तक ही, जो व्यक्ति अपने जीवन में जरूरत से ज्यादा सोता या विश्राम करता है, वो कई तरह के अवसरों को खो रहा है। इस पर एक कहावत भी है कि, जो सोता है, वो खोता है। महात्मा विदुर कहते हैं कि, अधिक सोने वाला मनुष्य तन, मन और धन तीनों ही रूप से कमजोर होता है।
षड् दोषा: पुरुषेणेह हातव्या भूतिमिच्छिता।
निद्रा तन्द्रा भयं क्रोध आलस्यं दीर्घसूत्रता ॥
अर्थात्- अगर आपको अपने जीवन में सफल होना है, तो निद्रा की तरह तंद्रा को भी त्यागना पड़ेगा। कहने का मतलब शारीरिक या मानसिक रूप से हमेशा थकान महसूस करना या काम में मन न लगना। यह आदत व्यक्ति एकाग्रता पर नकारात्मक प्रभाव दिखाती है।
अलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः। नास्त्युद्यमसमो बन्धुः कृत्वा यं नावसीदति ॥
अर्थात्- इंसान के शरीर में रहने वाला उसका सबसे बड़ा दुश्मन है उसका शरीर ही है। मेहनत के समान इंसान का कोई दूसरा मित्र नहीं होता, क्योंकि मेहनत करने वाला इंसान कभी उदास नहीं होता।
छठा दोष दीर्घसूत्रीदीर्घसूत्री का अर्थ है कि, जो व्यक्ति हर कार्य को करने में काफी समय व्यर्थ करता है। भगवद्गीता के अध्याय 18 और श्लोक 28 में बताया गया है कि,
अयुक्त: प्राकृत: स्तब्ध: शठो नैष्कृतिकोऽलस:|
विषादी दीर्घसूत्री च कर्ता तामस उच्यते || 28||
अर्थात्- जो मनुष्य अनुशासनहीन, अशिष्ट, हटी, कपटी, आलसी और निराश किस्म का होता है और काम को टाल-मटोल करता है, वह तमोगुणी कहलाता है। महात्मा विदुर कहते हैं कि, किसी कार्य को करना हो, तो उसे फौरन ही कर देना चाहिए। कभी भी कल पर नहीं टालना चाहिए, अन्यथा कई बार जीवन दूसरा मौका नहीं देता है।
विदुर नीति की यह बात सिर्फ विद्यार्थी वर्ग के लिए नहीं है, बल्कि उन सभी के लिए है जो जीवन में कुछ न कुछ कार्य कर रहे हैं, कुछ नया सीख रहे हैं।
चाणक्य नीति में साफ-साफ कहा गया है कि-
काक चेष्टा बको ध्यानं, श्वान निद्रा तथैव च। अल्पाहारी गृहत्यागी, विद्यार्थी पंच लक्षणं ॥
अर्थात्- एक विद्यार्थी को जो कोई भी व्यक्ति हो सकता है। उसके कौवे की तरह जानने की इच्छा हो। बगुले की तरह ध्यान, कुत्ते की तरह निद्रा यानी सोना, अल्पहारी यानी जितनी जरूरत उतना ही खाने वाला और गृह त्यागी होना चाहिए।



