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जब 15 दिनों के लिए बीमार पड़ जाते हैं भगवान जगन्नाथ, बंद रहते हैं मंदिर के कपाट…

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ओडिशा के पुरी में भगवान जगन्नाथ जी का मंदिर है. ये मंदिर चार पावन धामों का हिस्सा माना जाता है. मंदिर में श्रीकृष्ण भगवान जगन्नाथ जी के रूप में विराजमान हैं. यहां हर साल जगन्नाथ जी की विश्व प्रसिद्ध रथयात्रा निकाली जाती है. ये सनातन पंरपरा के सबसे बड़े त्योहारों में से एक है, जिसमें लाखों श्रद्धालु शामिल होते हैं. रथयात्रा के दौरान भगवान जगन्नाथ जी अपने बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा जी के साथ रथों पर सवार होकर गुंडिचा देवी मंदिर तक यात्रा करते हैं. गुंडिचा देवी भगवान की मौसी मानी जाती हैं.इस महापर्व में शामिल होकर श्रद्धालु भगवान के दर्शन करते हैं और रथों को खींचते हैं. मान्यता है कि ऐसा करने से पाप मिट जाते हैं. इस साल भगवान जगन्नाथ जी की रथयात्रा का पावन उत्सव 16 जुलाई से प्रारंभ होकर 24 जुलाई तक चलेगा. भगवान जगन्नाथ जी से जुड़े कई रहस्य हैं. कहा जाता है कि रथयात्रा के 15 दिन पहले भगवान बीमार पड़ जाते हैं, तब उनको औषधीय भोग अर्पित किया जाता है. इस समय को ‘अनसर काल’ या ‘अनवसर’ कहते हैं.

स्नान के बाद भगवान पड़ जाते हैं बीमार:- रथयात्रा के पहले ज्येष्ठ माह की पूर्णिमा के दिन स्नान पूर्णिमा आयोजित की जाती है. इस मौके पर जगन्नाथ जी, बलभद्र और देवी सुभद्रा का 108 पावन कलशों में भरे जल से विशेष अभिषेक किया जाता है. ऐसी मान्यता है कि इसके बाद ही भगवान जगन्नाथ को बुखार आ जाता है. फिर वो लगभग 15 दिन बीमार रहते हैं. इसी को ‘अनसर काल’ या ‘अनवसर’ के रूप में जाना जाता है. इस दौरान मंदिर के कपाट बंद रहते हैं और भगवान को औषधीय भोग लगाया जाता है.

रथयात्रा का है विशेष धार्मिक महत्व:- धार्मिक मान्यता है कि जगन्नाथ जी की रथयात्रा में श्रद्धा के साथ भाग लेने और रथ की रस्सियां खींचने से विषेष पुण्य फलों की प्राप्ति होती है. लोक मान्यता है कि जगन्नाथ जी के रथ के पहिओं की रस्सियां खींचने से अनजाने में किए सभी पाप कट जाते हैं. साथ ही भगवान जगन्नाथ की विशेष कृपा प्राप्त होती है. भगवान सिर्फ मंदिरों में नहीं हैं, बल्कि वो भक्तों के बीच आकर उनको दर्शन देते हैं. यही रथयात्रा के महापर्व का अध्यात्मिक संदेश है.

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