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बोलकर या मन में? जानिए क्या है मंत्र जाप करने का सही तरीका और नियम

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हिंदू धर्म में जाप का अर्थ सिर्फ मंत्र को दोहराना नहीं है। यह पारंपरिक विज्ञान है, जो मानव शरीर को ब्रह्मांड और ब्रह्मांडीय व्यवस्था के अनुरूप बनाता है। एक मनुष्य शरीर की कल्पना पंचकोशों से की जाती है, जिसमें अन्नमय, प्राणमय, मनोमय,विज्ञानमय और आनंदमय और त्रि शरीर, स्थूल शरीर, सूक्ष्म शरीर और कारण शरीर शामिल है।

जब हम मंत्र जाप करते हैं, तो उससे जो आवाज या कंपन (Vibrations) उत्पन्न होती है, वे हमारे अशांत मन को शांत करते हैं। अक्सर मंत्रों को अक्षरों का समूह माना जाता है, जबकि असल में यह आवाज और अक्षरों का समूह है। यही वजह है कि, मंत्रोच्चारण मुख्य रूप से दो तरह के होते हैं मौन मंत्रोच्चारण (मन में मंत्र का जाप करना) और मुखर मंत्रोच्चारण (बोलकर जाप करना) है।बोलकर मंत्र जाप करना जब व्यक्ति मंत्र का उच्चारण तेज स्वर में करता है, तो ध्वनि सुनाई देती है।

यह अवस्था जरूरी है क्योंकि इसमें शरीर सबसे पहले सक्रिय होता है। श्वास लयबद्ध हो जाती है, छाती खुल जाती है और कंपन पूरे शरीर में दौड़ जाता है।यह वातावरण को तैयार करने में भी मदद करता है। ध्वनि का असर मन को शुद्ध करता है, इसलिए तेज स्वर में जप करने से अभ्यास के लिए अनुकूल वातावरण बनता है, बजाए इसके कि किसी बिखरे हुए वातावरण में इसकी शुरुआत करनी हो। जब मन सुस्त या काफी विचलित होता है, तो वैखरी उसे जल्द वापस लाती है क्योंकि इसमें शरीर, श्वास और वाणी सभी हिस्सा लेते हैं। इसलिए जप की शुरुआत में यह हमेशा उपयोग होता है।

मन में जाप करना
उपांशु वह अवस्था होती है, जब मंत्र का जाप मन में या एकदम धीमी स्वर में किया जाता है। यहां आवाज आंतरिक भावों की ओर ध्यान देने लगता है। उपांशु विचारों के प्रवाह को स्थिर करने में मददगार होता है और मंत्र तथा आंतरिक भावना के बीच सामंजस्य स्थापित करता है।

यह मन की निरंतरता को भंग किए बिना ही बेचैनी को कम करता है, इसलिए यह जोर से जप करने और मन में लगातार दोहराने के बीच ब्रिज की भूमिका निभाता है।

मौन मंत्रोच्चारण (मानसिका)
मानसिका का मतलब है कि, मंत्र को पूरी तरह मन में जाप करना। इसमें न तो कोई आवाज आती है, और न ही हलचल होती है। सिर्फ चेतना ही जाप को धारण करती है।

इस अवस्था में मंत्र सूक्ष्म शरीर यानी सूक्ष्म शरीर पर कार्य करना शुरू कर देता है और पंचकोश की गहन परतों को प्रभावित करता है। यह विचार पद्धति को शुद्ध करता है। निरंतर और नियमित अभ्यास के जरिए जाप औपचारिक जप के बाहर भी शांत रूप से जारी रह सकता है।

मंत्र जाप करने की सही विधि
सबसे आसान विधि यह है कि, कुछ मिनटों के वैखरी जाप से शुरुआत करनी चाहिए, ताकि शरीर और वातावरण तैयार हो सकें। फिर मन को स्थिर करते हुए मंत्र को उपांशु जाप में धीरे-धीरे बदलना चाहिए।

वहां से यह स्वाभाविक रूप से मानसिक जाप में प्रवेश करता है, जहां जाप आंतरिक हो जाता है। इस क्रम में मंत्र की आवाज से मन और फिर व्यक्ति की सूक्ष्म चेतना जाग्रत होती है।

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