वरिष्ठ कृषि सलाहकार एवं जलवायु अनुकूल कृषि विशेषज्ञ, रायपुर (छत्तीसगढ़)
21% वर्षा की कमी ने बढ़ाई चिंता: छत्तीसगढ़ में धान रोपाई प्रभावित, जलवायु अनुकूल “सर्कुलर एग्रीकल्चर” अपनाने की आवश्यकता
राधेश्याम सोनवानी गरियाबंद , 13 जुलाई :- छत्तीसगढ़ में जुलाई के प्रथम पंद्रह दिनों के दौरान सामान्य से लगभग 21 प्रतिशत वर्षा की कमी दर्ज की गई है, जिसके कारण प्रदेश के अनेक जिलों में खरीफ सीजन की धान रोपाई अभी तक पूर्ण रूप से शुरू नहीं हो सकी है। यह स्थिति केवल मौसम की अनियमितता नहीं, बल्कि जलवायु परिवर्तन (Climate Change) के बढ़ते प्रभाव का स्पष्ट संकेत है।
प्रदेश की लगभग 75 प्रतिशत कृषि वर्षा आधारित (Rainfed Agriculture) होने के कारण मानसून में थोड़ी-सी भी देरी किसानों की आजीविका, कृषि उत्पादन और खाद्य सुरक्षा पर प्रतिकूल प्रभाव डालती है। धान की रोपाई में विलंब से फसल अवधि कम हो जाती है, कीट एवं रोगों का प्रकोप बढ़ने की आशंका रहती है तथा उत्पादन और किसानों की आय प्रभावित होती है।
कृषि एवं जलवायु विशेषज्ञों का मानना है कि इस चुनौती का समाधान केवल अच्छी वर्षा की प्रतीक्षा करना नहीं, बल्कि सर्कुलर एग्रीकल्चर (Circular Agriculture) जैसी टिकाऊ एवं जलवायु अनुकूल कृषि प्रणाली को बढ़ावा देना है। इस मॉडल में कृषि अपशिष्ट को कम्पोस्ट एवं बायोचार में परिवर्तित कर मिट्टी की उर्वरता बढ़ाई जाती है, जल संरक्षण को प्राथमिकता दी जाती है, कृषि वानिकी (Agroforestry), एकीकृत कृषि प्रणाली तथा नवीकरणीय ऊर्जा के उपयोग को बढ़ावा दिया जाता है। इससे मिट्टी की गुणवत्ता सुधरती है, जल धारण क्षमता बढ़ती है और किसान जलवायु संबंधी जोखिमों का बेहतर सामना कर सकते हैं।
छत्तीसगढ़ में जनजातीय क्षेत्रों की पारंपरिक वन उत्पाद आधारित आजीविका, किसान उत्पादक संगठन (FPO), महिला स्व-सहायता समूह (SHG) तथा प्राकृतिक संसाधनों का समृद्ध आधार पहले से उपलब्ध है। आवश्यकता इन प्रयासों को एक समग्र नीति के माध्यम से जोड़ने की है।
कृषि एवं मौसम विशेषज्ञों ने राज्य सरकार एवं नीति निर्माताओं से “छत्तीसगढ़ राज्य सर्कुलर एग्रीकल्चर मिशन” प्रारंभ करने, किसानों को बायोचार, कम्पोस्ट एवं कार्बन क्रेडिट के लिए प्रोत्साहन देने तथा आईसीएआर (ICAR), इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय (IGKV), एफएओ (FAO), यूएनडीपी (UNDP), विश्व बैंक (World Bank) एवं एशियाई विकास बैंक (ADB) जैसे संस्थानों के सहयोग से डिजिटल जलवायु परामर्श एवं जल बजट प्रणाली विकसित करने का आग्रह किया है।
कृषि एवं मौसम विशेषज्ञों का कहना है कि जुलाई की यह वर्षा कमी केवल एक चेतावनी है, अंतिम परिणाम नहीं। यदि समय रहते जलवायु अनुकूल, संसाधन-सक्षम और सर्कुलर कृषि नीतियों को अपनाया गया, तो छत्तीसगढ़ न केवल जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों का सफलतापूर्वक सामना कर सकेगा, बल्कि टिकाऊ कृषि विकास का राष्ट्रीय मॉडल भी बन सकता है।
छत्तीसगढ़ के लिए सर्कुलर एग्रीकल्चर एवं जलवायु अनुकूल कृषि नीति (संक्षिप्त सुझाव)
1. छत्तीसगढ़ सर्कुलर एग्रीकल्चर मिशन – जलवायु अनुकूल एवं संसाधन-कुशल कृषि को बढ़ावा देने हेतु राज्य स्तरीय मिशन।
2. जिला स्तरीय सर्कुलर एग्रीकल्चर क्लस्टर – प्रत्येक जिले में मॉडल गांव विकसित कर सर्कुलर कृषि का प्रदर्शन।
3. फसल अवशेष प्रबंधन एवं बायोचार नीति – धान के पुआल से बायोचार, कम्पोस्ट एवं बायो-एनर्जी उत्पादन को प्रोत्साहन।
4. ग्राम स्तरीय कम्पोस्ट एवं जैविक उर्वरक केंद्र – महिला स्व-सहायता समूह (SHGs) एवं FPO के माध्यम से संचालन।
5. कार्बन क्रेडिट एवं हरित प्रोत्साहन योजना – बायोचार, कृषि वानिकी एवं पुनर्योजी कृषि अपनाने वाले किसानों को प्रोत्साहन।
6. जल बजट एवं वर्षा जल संचयन नीति – प्रत्येक पंचायत में वार्षिक जल बजट एवं जल संरक्षण संरचनाओं का विकास।
7. जलवायु स्मार्ट धान एवं फसल विविधीकरण कार्यक्रम – कम वर्षा वाले क्षेत्रों में मोटे अनाज, दलहन एवं तिलहन को बढ़ावा।
8. डिजिटल क्लाइमेट एडवाइजरी सिस्टम – मौसम आधारित फसल, सिंचाई एवं कीट प्रबंधन संबंधी सलाह किसानों तक मोबाइल के माध्यम से पहुँचाना।
9. सर्कुलर एग्रीकल्चर इनोवेशन फंड – स्टार्टअप, FPO एवं ग्रामीण उद्यमियों को हरित कृषि तकनीकों हेतु वित्तीय सहायता।
10. कृषि अपशिष्ट आधारित ग्रामीण उद्यम – बायोचार, बायोगैस, कम्पोस्ट, बायो-पैलेट एवं मूल्य संवर्धन इकाइयों की स्थापना।
11. मिट्टी स्वास्थ्य एवं कार्बन संवर्धन कार्यक्रम – मृदा जैविक कार्बन बढ़ाने के लिए जैविक पदार्थों एवं प्राकृतिक खेती को प्रोत्साहन।
12. अंतर-विभागीय समन्वय तंत्र – कृषि, उद्यानिकी, वन, जल संसाधन, ग्रामीण विकास एवं पंचायती राज विभागों के समन्वित प्रयास।
अपेक्षित परिणाम
• जलवायु परिवर्तन के प्रति अधिक लचीली (Climate Resilient) कृषि प्रणाली।
• मिट्टी की उर्वरता एवं जल संरक्षण में सुधार।
• कृषि लागत में कमी एवं किसानों की आय में वृद्धि।
• कृषि अपशिष्ट से अतिरिक्त रोजगार एवं हरित उद्यमों का विकास।
• कार्बन उत्सर्जन में कमी एवं सतत कृषि को बढ़ावा।



