18 दिनों तक कुरुक्षेत्र में चलने वाले महाभारत के युद्ध में कौरवों की हार हुई थी और पांडवों की जीत, मगर इस जीत का जश्न पांडव कभी नहीं मना पाए। अपनों को खोने के वियोग के साथ-साथ पांडवों के सीने में अपने पांच पुत्रों की हत्या का दर्द भी छुपा हुआ था।
हालांकि, पुत्रों को खोने का दर्द इसलिए भी ज्यादा गहरा था क्योंकि जंग के मैदान में वे शहीद नहीं हुए थे, बल्कि युद्ध के बाद धोखे से उनकी हत्या की गई थी। यह हत्या किसी और ने नहीं बल्कि गुरु द्रोणाचार्य के पुत्र अश्वत्थामा ने की थी। पुत्रों की हत्या के अपराध के बदले में द्रौपदी ने अश्वत्थामा को कभी न मरने का श्राप दिया था।
यह कहानी यहीं खत्म नहीं होती है, बल्कि इसकी रोचकता तो अश्वत्थामा को श्राप मिलने के बाद शुरू होती है। चलिए हम आपको बताते हैं इस श्राप का रहस्य।
द्रौपदी के पुत्रों की हत्या कैसे हुई?
महाभारत का युद्ध खत्म हो चुका था। युद्ध की थकान से चूर-चूर द्रौपदी के पांचों पुत्र शिविर में गहरी नींद में सो रहे थे। तभी अश्वत्थामा ने शिविर में पहुंच कर सोते हुए द्रौपदी पुत्रों की हत्या कर दी।
द्रौपदी ने क्यों दिया अश्वत्थामा को अमर होने का श्राप?
गुरु द्रोणाचार्य द्रौपदी के गुरु थे। शास्त्रों में गुरु के पुत्र को भी गुरु का ही दर्जा दिया जाता है। इसके अतिरिक्त द्रौपदी पुत्र वियोग में भी इस बात को अच्छी तरह से समझ सकती थी कि अश्वत्थामा की मृत्यु का शोक माता कृपी को पीड़ा देगा। माता कृपी के सम्मान गुरु द्रोण की शिक्षा को ध्यान में रखते हुए द्रौपदी ने अश्वत्थामा को मारने की जगह, उसे चीरकाल तक जीवित रहने और सूक्ष्म तुच्छ कण के रूप में धरती पर वर्षों तक भटकते रहने का श्राप दिया था। कहा जाता है कि अश्वत्थामा कलियुग में भी जीवित हैं और धरती पर ही, जहां नकारात्मकता होती है, वहां उनकी उपस्थिति होती है।
अर्जुन ने छीन ली थी अश्वत्थामा की मणि
अश्वत्थामा के जन्म के समय से ही उसके मस्तक पर एक दिव्य मणि थी। मणि ही उसे अस्त्र-शस्त्र से सुरक्षित रखती थी और भूख-प्यास और थकान से दूर रखती थी। इतना ही नहीं, इस मणि की शक्ति के कारण ही अश्वत्थामा द्रौपदी के पुत्रों को मारने में कामयाब हो पाया था। इइस मणी को अर्जुन ने श्रीकृष्ण के कहने पर उसके मस्तक से निकाल लिया था।इस मणि को बाद में द्रौपदी को सौंप दिया गया था।
अतः द्रौपदी के द्वारा अश्वत्थामा को मिला अमर रहने का वरदान एक श्राप था और जो अपराध उसने किया था, उसका दंड था।



