सक्ती : भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का पर्व आज देशभर में श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जा रहा है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भाद्रपद कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मध्यरात्रि की बेला में रोहिणी नक्षत्र में कंस के कारागार में भगवान श्रीकृष्ण का अवतार हुआ था। मध्यरात्रि में भगवान के जन्म के साथ ही मंदिरों और घरों में विशेष पूजा-अर्चना एवं उत्सव का आयोजन किया जाएगा।
भागवत प्रवाह के संस्थापक आचार्य राजेंद्र जी महाराज ने भगवान श्रीकृष्ण के अवतार और उनकी लीलाओं के विभिन्न प्रसंगों का उल्लेख करते हुए कहा कि श्रीकृष्ण केवल असुरों और राक्षसों के संहार के लिए अवतरित नहीं हुए थे, बल्कि उनकी लीलाओं में धरती, जल और फल-संपदा के संरक्षण का संदेश भी निहित है।
64 कलाओं से परिपूर्ण थे भगवान श्रीकृष्ण
आचार्य राजेंद्र महाराज के अनुसार, संपूर्ण देवताओं में भगवान श्रीकृष्ण 64 कलाओं से परिपूर्ण माने जाते हैं। उनके अवतार का उद्देश्य अधर्म और अत्याचार का अंत करने के साथ-साथ समाज एवं प्रकृति को आतताइयों से मुक्त करना भी था।
उन्होंने कहा कि आज के समय में जल, जंगल और जमीन को लगातार नुकसान पहुंचाया जा रहा है। ऐसे में भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं और उनके संदेशों को समझना और उनसे प्रेरणा लेना बेहद महत्वपूर्ण है।
कालिया नाग का मर्दन और यमुना संरक्षण का संदेश
आचार्य राजेंद्र महाराज ने भगवान श्रीकृष्ण की कालिया नाग मर्दन लीला का उल्लेख करते हुए बताया कि यमुना नदी का एक क्षेत्र कालिया नाग के कारण विषाक्त हो गया था। धार्मिक कथा के अनुसार, वहां का जल इतना विषैला हो गया था कि उसे पीना तो दूर, स्पर्श करना भी ब्रजवासियों के लिए घातक था।
भगवान श्रीकृष्ण ने कालिया नाग का मर्दन कर उसे यमुना से बाहर जाने के लिए विवश किया। इस प्रसंग को उन्होंने जल संरक्षण और प्रदूषण से मुक्ति के संदेश से जोड़ते हुए कहा कि श्रीकृष्ण की लीलाएं आज भी समाज को प्रकृति के प्रति जिम्मेदारी का बोध कराती हैं।
धेनुकासुर वध से जुड़ा वन और फल संरक्षण का संदेश
इसी तरह तालवन में धेनुकासुर के आतंक का प्रसंग बताते हुए आचार्य राजेंद्र महाराज ने कहा कि वहां के वृक्षों और फलों पर उसका अधिकार था। भगवान श्रीकृष्ण और बलराम ने धेनुकासुर का अंत कर तालवन को ब्रजवासियों के लिए सुरक्षित किया।
उन्होंने कहा कि इस प्रसंग में भी वन और फल-संपदा को समाज के हित में सुरक्षित रखने का संदेश दिखाई देता है।
भौमासुर का अंत और धरती को अत्याचार से मुक्ति
आचार्य राजेंद्र महाराज ने भौमासुर के प्रसंग का उल्लेख करते हुए कहा कि वह धरती पर अपना अधिकार जमाना चाहता था। भगवान श्रीकृष्ण ने उसकी राजधानी प्राग्ज्योतिषपुर पर आक्रमण कर उसका वध किया और उसके अत्याचार का अंत किया।
उन्होंने कहा कि भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं में अन्याय, अत्याचार और अनधिकृत कब्जे के विरुद्ध संघर्ष का संदेश भी मिलता है।
श्रीकृष्ण के उपदेशों को जीवन में उतारने की अपील
आचार्य राजेंद्र महाराज ने कहा कि भगवान श्रीकृष्ण केवल आराधना के पात्र ही नहीं, बल्कि उनके उपदेश मानव जीवन के लिए मार्गदर्शक हैं। उन्होंने लोगों से श्रीकृष्ण के संदेशों को अपने जीवन में आत्मसात करने और अपने कर्मक्षेत्र में पूरी निष्ठा के साथ दायित्वों का निर्वहन करने का आग्रह किया।
उन्होंने कहा कि कर्म ही पूजा है, इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन में श्रेष्ठ और अच्छे कर्म करने का संकल्प लेना चाहिए। जन्माष्टमी का पर्व केवल उत्सव मनाने तक सीमित न रहे, बल्कि भगवान श्रीकृष्ण के आदर्शों और उनके कर्मयोग के संदेश को जीवन में उतारने का अवसर बने।




