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बरसात में भीगते सपनों पर इंसानियत की चादर बिछी,जहां बारिश बनी तकलीफ, वहां एक इंसान बना राहत की बूंद,रेनकोट बांटते दिखे इमरान — लोग कहते हैं ‘इम्मू दिलेर’

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राधेश्याम सोनवानी गरियाबंद  : बारिश की पहली बूंद जहां कुछ लोगों को सुकून देती है, वहीं यह बूंदें कुछ ज़रूरतमंदों के लिए संघर्ष की आंधी बन जाती हैं। रोज़ी-रोटी के लिए दूर-दराज़ गांवों से शहर आने वाले मज़दूरों और गरीबों के लिए बारिश भीगने की नहीं, पेट भरने की चुनौती बन जाती है। न छत होती है, न छाता — और काम पर जाना जरूरी। ऐसे में जब समाजसेवी इमरान उर्फ ‘इम्मू दिलेर भाई जान’ की नज़र ऐसे भीगते, कांपते मेहनतकश लोगों पर पड़ी, तो उनका दिल पसीज गया।

इम्मू ने तुरंत एक विशेष मुहिम की शुरुआत की — “बारिश में भी रोटी न रुके”, जिसके तहत उन्होंने ज़रूरतमंदों को छाते और रेनकोट बांटना शुरू किया। उनकी इस पहल ने न सिर्फ लोगों को बारिश से बचाया, बल्कि एक संवेदनशील समाज की मिसाल भी पेश की।

इमरान उर्फ इम्मू दिलेर कहते है :

“अक्सर गरीब मज़दूर शहर आकर घर बनाते हैं, किसी की दुनिया सजाते हैं, और लौटते वक्त बारिश उन्हें भीगने पर मजबूर कर देती है। बीमार होना उनके लिए रोज़ी रुकने जैसा है। यही सोचकर मैंने ये छोटी सी मुहिम शुरू की है—कि कोई भी ज़रूरतमंद बारिश में यूँ ना भीगे।”

इमरान का कहना है कि बारिश सिर्फ भीगने की बात नहीं है, गरीब के लिए ये उसकी दिहाड़ी, उसका खाना, उसके बच्चों की भूख तक पहुंचने का रास्ता रोक देती है। ऐसे में समाज के सक्षम वर्ग को आगे आना चाहिए। “अगर आपके पास छाते हैं, तो किसी के लिए एक और खरीदकर दे दीजिए, किसी को बारिश में सूखा छोड़ दीजिए।”

जनसेवा के लिए जाना जाता है नाम ‘इम्मू दिलेर’

गरियाबंद में इमरान उर्फ इम्मू दिलेर भाई जान का नाम समाज सेवा का पर्याय बन चुका है। दिव्यांग स्कूल में बच्चों को खेलकूद सामग्री देना हो, वृद्धाश्रम में कूलर-कंबल, या दिवाली पर गरीब बच्चों को नए कपड़े—इम्मू हर बार ज़रूरतमंदों के साथ खड़े दिखे हैं। कोविड-19 महामारी के दौर में जब लोग घरों में कैद थे, तब इम्मू अपनी मोपेड पर दवा और खाना पहुंचाते नजर आते थे। उनकी यही लगातार सेवा भावना उन्हें आम से ‘दिलेर भाई जान’ बना गई।

इम्मू की अपील:

“आपसे बस यही गुज़ारिश है—अपने हिस्से की बारिश से किसी और को बचाइए, रेनकोट या छाता भले छोटा हो, लेकिन इंसानियत की छांव बड़ी होती है।”

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