भोलेनाथ को सावन का महीना और पवित्र कांवड़ यात्रा बेहद प्रिय है. इस माह में लाखों करोड़ों भक्त अपने कंधों पर पवित्र कांवड़ लेकर यात्रा करते हैं. कोई मनोकामना पूर्ण होने पर यात्रा करते हैं, तो कुछ भक्त कांवड़ को अपने कंधों पर उठाकर इसलिए भी यात्रा करते हैं कि उनकी भी मनोकामना पूर्ण हो जाए. कांवड़ यात्रा एक कठिन तपस्या है, जो मानसिक दृढ़ता से होती है. साथ ही कांवड़ यात्रा आस्था का प्रतीक भी है. जब कोई कावड़िया यात्रा करता है, तो भोलेनाथ से यही मनोकामना की जाती है कि उनकी यात्रा में कोई भी रुकावट ना आए. परिस्थितियां कांवड़ियों के अनुकूल ना होने के कारण उन्हें बीच में ही कांवड़ यात्रा छोड़नी पड़ती है, तो कुछ कांवड़िए अपनी मर्जी से यात्रा छोड़ देते हैं. कावड़ यात्रा बीच में छोड़ने पर अनेक बाधाएं और दोष लगता है.
कांवड़ यात्रा बीच में छोड़ने पर क्या समस्याएं आती है. उसकी ज्यादा जानकारी देते हुए हरिद्वार के विद्वान धर्माचार्य पंडित श्रीधर शास्त्री बताते हैं कि भोलेनाथ के निमित्त की जाने वाली कांवड़ यात्रा बेहद ही पवित्र होती है. यदि किसी श्रद्धालु के साथ कोई ऐसी घटना जैसे स्वास्थ्य खराब होना, परिवार में कोई अप्रिय घटना हो जाना, यात्रा करते हुए कांवड़ खंडित हो जाना आदि हो जाए, जिससे वह यात्रा करने में असमर्थ हो तो वह भोलेनाथ से क्षमा प्रार्थना करके अगले साल या उसके बाद यात्रा का संकल्प कर सकता है. ऐसा करने पर श्रद्धालु श्रद्धालुओं को कोई समस्या या बाधा नहीं आती है. भोलेनाथ दयालु होते हैं और भक्तों पर कृपा बनाए रखें.
पंडित श्रीधर शास्त्री आगे बताते हैं कि जब कोई शिव भक्त कांवड़ यात्रा करने का संकल्प लेता है और पवित्र कांवड़ अपने कंधों पर उठाकर यात्रा करता है तो उस पर भोलेनाथ की कृपा बनी रहती है, लेकिन यदि कोई श्रद्धालु या भक्त जान पूछ कर अपनी यात्रा बीच में ही छोड़ देता है तो उसे पाप लगता है और उसके जीवन में शारीरिक, मानसिक जैसी अनेक समस्याओं का आगमन शुरू हो जाता है. ऐसे व्यक्तियों को शारीरिक गंभीर रोग, मानसिक समस्याएं, मन विचलित रहना और परिवार में लड़ाई झगड़ा, कलह आदि होती रहती है साथ ही आर्थिक तंगी की समस्याओं से भी जूझना पड़ता है. यदि कोई व्यक्ति कांवड़ का संकल्प लेकर उसे बीच में ही छोड़ देता है और पूरा नहीं करता है तो उसे जन्म जन्मांतर तक इसका पाप भोगना पड़ता है.



