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11 या 12 नवंबर, कब है कालभैरव जयंती? जानें तिथि, पूजा विधि और महत्व….

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कालभैरव जयंती मार्गशीर्ष मास की कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाई जाती है. इसे भैरव अष्टमी या कालाष्टमी भी कहा जाता है. भगवान शिव के उग्र रूप कालभैरव की यह जयंती बहुत ही पावन और शक्तिशाली तिथि मानी जाती है. इस दिन भक्त भगवान भैरव की आराधना कर नकारात्मक शक्तियों, भय और पापों से मुक्ति की कामना करते है.

कब है कालभैरव जयंती: 11 या 12 नवंबर 2025:- इस साल कालभैरव जयंती की तिथि को लेकर लोगों के मन में दुविधा है कि यह 11 नवंबर को है या 12 नवंबर को. ज्योतिषीय गणना और उदया तिथि के अनुसार, कालभैरव जयंती की सही तिथि इस प्रकार है.

कालभैरव जयंती की पूजा विधि:- काल भैरव की पूजा मुख्य रूप से रात्रि के समय की जाती है, लेकिन दिनभर व्रत और पूजा का संकल्प लिया जाता है.

शुद्धिकरण और संकल्प: सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र पहनें.इसके बाद हाथ में जल, फूल और अक्षत लेकर व्रत/पूजा का संकल्प लें.

स्थापना: पूजा स्थान पर भगवान शिव-पार्वती और काल भैरव की तस्वीर या मूर्ति स्थापित करें.

दीपक और धूप: सरसों के तेल का चौमुखी (चार मुखों वाला) दीपक जलाएं और गुग्गल की धूप जलाएं.

अर्पण: भगवान को बेलपत्र, धतूरे के फूल, काले तिल, काली उड़द की दाल, फल और पंचामृत अर्पित करें.इमरती या जलेबी का भोग लगाना भी शुभ माना जाता है.

मंत्र जाप: रुद्राक्ष की माला से भगवान काल भैरव के मंत्रों का जाप करें.कम से कम 108 बार जाप करना चाहिए.

मंत्र: “ॐ कालभैरवाय नमः” या “ह्रीं उन्मत्त भैरवाय नमः”.

आरती और कथा: पूजा पूरी होने के बाद काल भैरव की कथा का पाठ करें और फिर आरती करें.

पितरों का श्राद्ध: इस दिन पितरों को याद कर उनका श्राद्ध करना भी शुभ माना जाता है.

कालभैरव जयंती का महत्व:- भगवान काल भैरव को समय और नियति का स्वामी माना जाता है, इसलिए उनकी पूजा का विशेष महत्व है. माना जाता है कि काल भैरव की सच्चे मन से की गई उपासना से व्यक्ति को हर तरह के संकटों, भय और नकारात्मक शक्तियों से सुरक्षा मिलती है. वे अपने भक्तों को भयंकर शत्रुओं से भी बचाते हैं. काल भैरव जयंती का व्रत रखने से भक्तों के सभी पापों और बाधाओं से मुक्ति मिलती है.

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