Home छत्तीसगढ़ प्रेमशीला बघेल को वीरांगना अवंतीबाई लोधी स्मृति सम्मान

प्रेमशीला बघेल को वीरांगना अवंतीबाई लोधी स्मृति सम्मान

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महासमुंद :  महिला सशक्तिकरण के क्षेत्र में महिलाओं की वीरता, शौर्य, साहस व आत्मबल को सशक्त करने के लिए महासमुंद की बेटी प्रेमशीला बघेल को वीरांगना अवंतीबाई लोधी स्मृति सम्मान से नवाजा गया। वे महासमुंद की पहली महिला हैं जिन्हें यह सम्मान मिला है। छत्तीसगढ़ राज्य स्थापना महोत्सव के समापन पर उप राष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन ने उन्हें राज्य अलंकरण से सम्मानित किया।

जानकारी के अनुसार प्रेमशीला बघेल को महिला सशक्तिकरण के क्षेत्र में बेहतर काम करने पर सम्मानित किया गया है। वे इस क्षेत्र में 1996 से काम कर रहीं हैं। महिलाओं और वंचित समुदायों के हक की लड़ाई में सक्रिय प्रेमशीला ने छत्तीसगढ़ महिला जागृति संगठन में 11 साल तक कार्यकर्ता के रूप में काम करते हुए हजारों महिलाओं की अधिकारों की लड़ाई लड़ीं, मुखर बनकर अपने स्वाभिमान की लड़ाई लड़ने के लिए उन्हें प्रोत्साहित किया। साल 2000 में भारत की 25 संघर्षरत महिलाओं के साथ छत्तीसगढ़ की ओर से प्रतिनिधित्व कर न्यूयॉर्क में आयोजित वर्ल्ड मार्च आॅफ वुमन में उन्होंने महिलाओं पर बढ़ती हिंसा और गरीबी जैसे ज्वलंत मुद्दे पूरी दुनिया के सामने उठाया और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराई।

समाज के मुख्य धारा से कटे लोगों की आवाज बनीं
साल 2005 से 2008 तक राजनांदगांव जिले में कुष्ठ पीड़ितों और दिव्यांगों का समूह बनाकर उनके साथ आजीविकामूलक कार्य किया। ऐसे 100 समूह बनाकर वंचित और समाज के मुख्य धारा से कटे लोगों की आवाज बनीं। महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए बुनकर महिलाओं को हाथकरघा से जोड़ा, साबुन निर्माण, कुम्हार महिलाओं को मिट्टी की आधुनिक कला से और बसोड़ महिलाओं को बांस शिल्प और घरेलू महिलाओं को महिला कैंटीन से जोड़कर आजीविका की नई परिभाषा गढ़ी। उन्होंने महिला हिंसा, शिक्षा, स्वास्थ्य, बाल श्रम और लैंगिक भेदभाव जैसे मुद्दों पर सम्मेलन, प्रशिक्षण, नुक्कड़ नाटक और कानूनी जागरूकता अभियान के माध्यम से संदेश देती रहीं।

19 साल की उम्र में समाजिक संस्था से जुड़ीं, फिर समाजसेवा को ही जीवन का लक्ष्य बनाया महासमुंद में जन्मी प्रेमशीला का बचपन अभावों और संघर्षों में बीता। माता-पिता दिहाड़ी मजदूर थे। दो बहनों में छोटी बेटी के रूप में वह घर की पहचान बनीं। बचपन में उन्हें घर में दो वक्त की रोटी भी मयस्सर न थी। शिक्षा, स्वास्थ्य और आत्मविश्वास तीनों ही उनके लिए सपने की तरह थे। 19 साल की उम्र में उनके पिता ने उन्हें एक सामाजिक संस्था से जोड़ा। इसके बाद उन्होंने समाजसेवा को ही अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया। यहीं से महिलाओं को जागरूक करने की उनकी यात्रा शुरू हुई, जो अब तक जारी है। विभिन्न स्वयं सेवी संस्थाओं में काम करने के बाद खुद का संगठन चलाने अपने अनुभवों को जमीन में उतारने की जिजीविषा ने एक नए संस्था उन्नयन जन विकास समिति की जन्म दिया। वर्ष 2005 में इस एनजीओ की मुखिया बनकर कमान संभाली।
15 हजार महिलाओं के समूह को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाया
प्रेमशीला ने जमीनी स्तर पर काम किया। उन्होंने काम करते हुए अपनी संस्था को मजबूत किया।

बहुत छोटे-छोटे फंड की मदद से सामाजिक मुद्दों पर कार्य करना शुरू किया। महासमुंद जिले में लगभग 1500 महिला समूहों के बैंक खातों का डिजिटलीकरण कराया। नाबार्ड, एनयूएलएम, जैसी योजनाओं के साथ ग्रामीण और शहरी 15 हजार महिलाओं के समूह को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में भी पहल की। आज भी प्रेमशीला महासमुंद के शहरी एवं ग्रामीण क्षेत्रों में एक ‘सोशल चेंज एजेंट’ के रूप में कार्य कर रही हैं। वे सिर्फ एक नाम नहीं, एक ‘सोशल वॉरियर’ हैं। उन्होंने महिलाओं को सिर्फ समूहों में नहीं जोड़ा, बल्कि उन्हें आत्मनिर्भरता, आत्मसम्मान और आत्मबल से भी जोड़ा।

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