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सालभर में एक बार खुलता है 800 साल पुराना मंदिर, ,जानें इस अद्भुत मंदिर की कहानी…

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देश में लाखों की संख्या में मंदिर हैं. इनमें से कुछ मंदिर विशेष देवी-देवताओं से संबंधित हैं. हर मंदिर का अपना इतिहास और परंपरा है. कुछ मंदिरों की परंपराएं आश्चर्यचकित करने वाली हैं. ऐसा ही एक मंदिर कर्नाटक के हसन जिले में स्थित है. ये हसनंबा मंदिर है. इसकी मुख्य देवी आदि शक्ति हैं, जोकि होयसला शैली में बना हुआ है. इसका निर्माण 12वीं शताब्दी यानी लगभग 800 साल पहले हुआ.मंदिर की विशेषता है कि यह साल में केवल एक बार भक्तों के लिए खुलता है, जिसका उन्हें बेसब्री से इंतजार रहता है. जिस दिन मंदिर खुलता है तो भक्तों का तांता लग जाता है. दरअसल, मंदिर केवल अक्टूबर में यानी दिवाली के दिन खुलता है.

जब मंदिर खुलता है तो क्या होता है:- दिवाली पर मंदिर खुलते ही बड़ी संख्या में श्रद्धालु दर्शन के लिए आते हैं. इस दौरान मंदिर में दो बोरी चावल, पानी और एक घी का दीपक (नंदा दीपम) रखा जाता है. साथ ही साथ उसको फूलों से सजाया जाता है और फिर बंद कर दिया जाता है. इसके बाद मंदिर एक साल बाद ही दोबारा खुलता है. जब मंदिर दोबारा खुलता है, तो चावल पके हुए मिलते हैं और वो उस दिन भी गर्म रहते हैं. वे खराब नहीं होते. नंदा दीपम में रखा घी एक साल तक जलता रहता है. इन्हीं विशेषताओं के कारण यह मंदिर विशेष बन गया है.

हसनंबा मंदिर की कहानी:- एक बार सात माताएं कहलाने वाली ब्राह्मी, महेश्वरी, कौमारी, वैष्णवी, वरकी, इंद्राणी और चामुंडी दक्षिण भारत आईं और हसन नामक स्थान की सुंदरता देखकर वहीं बसने का निर्णय लिया. महेश्वरी, कौमारी और वैष्णवी मंदिर के भीतर टीलों में रहने लगीं. ब्राह्मी केंजम्मा नामक स्थान पर रहने लगीं. इंद्राणी, वरकी और चामुंडी होंडा नामक स्थान पर एक कुएं में रहने लगीं.

हसनंबा का क्या है अर्थ:- हसनंबा का अर्थ है वह माता जो मुस्कुराते हुए अपने भक्तों को सभी वरदान प्रदान करती हैं. ऐसा माना जाता है कि जो लोग उनके भक्तों को कष्ट पहुंचाते हैं, उन्हें वह कठोर दंड देती हैं. मंदिर को लेकर कहा जाता है कि एक बार हसनंबा की एक भक्त मंदिर में प्रार्थना करने आई. तभी उसकी सास ने उसे बुरी तरह पीटा. जब भक्त ने गिड़गिड़ाकर प्रार्थना की, तो हसनंबा ने उस पर दया दिखाई. उन्होंने अपनी भक्त को पत्थर में बदल दिया और उसे अपने पास रख लिया. इस पत्थर को ‘शोशी कल’ कहा जाता है. शोशी का अर्थ है बहू. ऐसा माना जाता है कि यह पत्थर हर साल चावल के दाने के रूप में हसनंबा की ओर बढ़ता है. कहा जाता है कि यह कलियुग के अंत में हसनंबा तक पहुंचेगा.

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