वैशाख का महीना आते ही चारों ओर एक अलग ही उत्साह छा जाता है। इसी महीने की शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को हम परशुराम जयंती मनाते हैं। भगवान विष्णु के छठे अवतार माने जाने वाले परशुराम जी का जन्म इसी पावन दिन हुआ था। इसी दिन ‘अक्षय तृतीया’ जैसा महामुहूर्त भी होता है, जो इस दिन की महत्ता को कई गुना बढ़ा देता है।
दिलचस्प बात यह है कि उन्हें ‘चिरंजीवी’ माना जाता है। यानी वो आज भी इस धरती पर सशरीर मौजूद हैं और कलयुग के अंत तक रहेंगे।
पूजा मुहूर्त और तिथिसाल 2026 में तिथियों का गणना कुछ इस प्रकार है:
तृतीया तिथि की शुरुआत: 19 अप्रैल (रविवार), सुबह 10 बजकर 49 मिनट से
मुख्य तिथि (उदयातिथि):उदयातिथि और प्रदोष काल की गणना के आधार पर भगवान परशुराम जयंती 19 अप्रैल 2026, रविवार को मनाई जाएगी।
परशुराम जयंती: सरल पूजा विधिसुबह जल्दी उठकर स्नान करें। अगर व्रत रख रहे हैं, तो हाथ में जल लेकर व्रत और पूजा का संकल्प लें।
पूजा स्थल की सफाई करें और एक चौकी पर भगवान परशुराम की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें।
उन्हें चंदन और अक्षत लगाएं। फिर फूल, तुलसी दल और पीले फूलों की माला प्रेमपूर्वक अर्पित करें।
धूप और दीपक जलाएं। भगवान को ऋतु फल (सीजनल फ्रूट्स) और मिठाइयों का भोग लगाएं।
भगवान विष्णु के मंत्रों का जाप करें और परशुराम स्तुति का पाठ करें।
पूरी श्रद्धा के साथ परशुराम जी की आरती उतारें।
अंत में सभी को प्रसाद बांटें। इस दिन गरीबों और जरूरतमंदों को दान देना न भूलें।
परशुराम जयंती अक्षय तृतीया के दिन मनाई जाती है। मान्यता है कि इस दिन किया गया दान-पुण्य ‘अक्षय’ (कभी खत्म न होने वाला) फल देता है।
क्या कहते हैं शास्त्रों?भगवान परशुराम के जन्म और उनके अजेय होने की कथाएं ‘श्रीमद्भागवत पुराण’ और ‘ब्रह्मांड पुराण’ में विस्तार से मिलती हैं। इन ग्रंथों में बताया गया है कि ऋषि जमदग्नि और माता रेणुका के घर उनका जन्म हुआ था। इसके अलावा, ‘महाभारत’ और ‘भविष्य पुराण’ में भी उनके चिरंजीवी होने और कल्कि अवतार के गुरु बनने का रोचक उल्लेख मिलता है।



