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नो वर्क नो पेमेंट का सिद्धांत हर जगह नहीं होता लागू, राज्य सरकार को हाई कोर्ट ने दिया ये आदेश

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बिलासपुर :छत्तीसगढ़ बिलासपुर हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा है, काम नहीं तो वेतन नहीं’ का सिद्धांत सार्वभौमिक रूप से लागू नहीं होता, प्रत्येक मामले के तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर इसे लागू किया जाना चाहिए। यह प्रत्येक प्रकरण के तथ्य तथा परिस्थतियों पर निर्भर करता है। कोर्ट ने याचिकाकर्ता को उपायुक्त और सहायक आयुक्त के पदों के वेतन के अंतर का 50%, 13.जुलाई 2011 से 31.दिसंबर.2016 तक की अवधि के लिए गणना करके, इस आदेश की प्रति प्राप्त होने की तिथि से चार माह की अवधि के भीतर भुगतान करे। निर्धारित अवधि के भीतर भुगतान न करने की स्थिति में, पूरी राशि पर भुगतान होने तक 6% प्रति वर्ष की दर से ब्याज लगेगा।

जीआर. साहू रिटायर्ड असिस्टेंट कमिश्नर ट्राइबल वेलफेयर ने अधिवक्ता श्रेया जायसवाल के जरिए छत्तीसगढ़ बिलासपुर हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी। याचिकाकर्ता ने कोर्ट से मांग की थी, डीपीसी. की सिफारिश की तिथि से पदोन्नत की जाए। जितेंद्र गुप्ता व ए नवरंग ऊपर रखते हुए, वेतन के बकाया, आगे की पदोन्नति के लिए वरिष्ठता और पेंशन के संशोधन के साथ।

2. याचिका लंबित रहने के दौरान, राज्य शासन ने 29 नवंबर 2019 के आदेश द्वारा याचिकाकर्ता को अनुसूचित जनजाति एवं अनुसूचित जाति विकास विभाग में उपायुक्त के पद पर 13 जुलाई 2011 से नाममात्र पदोन्नति दे दी, जो ‘काम नहीं तो वेतन नहीं’ के सिद्धांत को लागू करते हुए की गई थी। लिहाजा उनकी वरिष्ठता, वेतन, पेंशन और ग्रेच्युटी में संशोधन किया गया।

पढ़िए क्या है मामला?

याचिकाकर्ता जीआर साहू,अनुसूचित जनजाति एवं अनुसूचित जाति विकास विभाग में सहायक आयुक्त के पद पर कार्यरत थे और 31 दिसंबर2016 को उनकी सेवानिवृत्ति की आयु समाप्त हो गई। 01 अप्रैल 2008 को जारी सहायक आयुक्तों की श्रेणी सूची के अनुसार, क्रमांक 16 पर थे, जबकि जितेंद्र गुप्ता व ए नवरंग 17 और 19 पर थे। हालांकि, 13.जुलाई 2011 के आदेश द्वारा दोनों को उप आयुक्त के पद पर पदोन्नत किया गया, जबकि उसे पदोन्नति से वंचित कर दिया गया।

पीएससी की सिफारिश के बाद भी नहीं किया प्रमोशन, आधा दर्जन अभ्यावेदन को किया अनसुना

याचिकाकर्ता के अनुसार उसने पदोन्नति पर विचार करने के लिए 07 सितंबर.2010 और 04.फरवरी 2011 को अभ्यावेदन प्रस्तुत किए थे, लेकिन उन पर कोई निर्णय नहीं लिया गया। इसके बाद, 31.जनवरी 2014 को राज्य सराकर ने विभागीय पदोन्नति समिति की 10 जुलाई.2012 की सिफारिशों के आधार पर एक आदेश जारी किया, जिसके द्वारा उसे सहायक आयुक्त के पद पर 07 सितंबर 2006 से पूर्वव्यापी प्रभाव से वरिष्ठता प्रदान की गई और उनकी वरिष्ठता, जितेंद्र गुप्ता से ऊपर निर्धारित की गई।

15.जुलाई 2014 को छत्तीसगढ़ लोक सेवा आयोग को एक प्रस्ताव भेजा गया था जिसमें उसे अन्य पात्र अधिकारियों के मामले पर उपायुक्त पद पर पदोन्नति के लिए डीपीसी की बैठक बुलाने का अनुरोध किया गया था। इसके बाद, 20. फरवरी 2015 को समीक्षा डीपीसी की बैठक हुई, जिसमें यह सिफारिश की गई कि उसे पदोन्नति के लिए योग्य माना गया। इसके बाद याचिकाकर्ता ने कई अभ्यावेदन प्रस्तुत किए, जिनमें पदोन्नति के लिए उसके मामले पर विचार करने का अनुरोध किया गया था।

हाई कोर्ट में दायर की रिट याचिका

सीजीपीएससी की सिफारिश के बाद भी जब राज्य शासन ने पदोन्नति नहीं दी, तब आधा दर्जन से अधिक बार विभाग के समक्ष अभ्यावेदन पेश किया। कोई कार्रवाई ना होने पर छत्तीसगढ़ बिलासपुर हाई कोर्ट में रिट याचिका दायर की। 22 जुलाई 2016 के आदेश द्वारा कोर्ट ने राज्य शासन को याचिकाकर्ता के पदोन्नति के दावे पर विचार करने का निर्देश दिया और निर्णय लेते समय पीएससी की सिफारिशों को भी ध्यान में रखने को कहा।

हाई कोर्ट में दायर की अवमानना याचिका

हाई कोर्ट के आदेश पर अमल ना होने पर याचिकाकर्ता ने न्यायालयीन आदेश की अवहेलना का आरोप लगाते हुए अवमानना याचिका दायर की। कोर्ट ने याचिकाकर्ता के दावे पर शीघ्र विचार करने का निर्देश राज्य सरकार को दिया था। इस आदेश केबाद याचिकाकर्ता ने 24 नवंबर 2016 और 26 नवंबर 2016 को पुनः अभ्यावेदन प्रस्तुत किया, इस आशा के साथ कि उसे सेवानिवृत्ति की आयु प्राप्त करने से पहले, यानी 31 दिसंबर 2016 को पदोन्नति दी जाएगी।

राज्य सरकार ने नो वर्क नो पेमेंट की तर्ज पर दी काल्पनिक पदोन्नति

एक वर्ष बाद, 29 दिसंबर 2017 को कुछ और अधिकारियों को सहायक आयुक्त के पद से उपायुक्त के पद पर पदोन्नत किया गया, लेकिन याचिकाकर्ता की पदोन्नति के संबंध में कोई आदेश जारी नहीं किया गया। उन्होंने 10 जनवरी 2019 और 21 जनवरी 2019 को अभ्यावेदन प्रस्तुत कर लोक सेवा आयोग की सिफारिशों के अनुसार पदोन्नति का अनुरोध किया। दोबारा याचिका दायर करने के बाद याचिकाकर्ता को 29 नवंबर 2019 को 13.जुलाई.2011 से पूर्वव्यापी प्रभाव से काल्पनिक पदोन्नति प्रदान की गई।

दूसरी रिट याचिका में मांगा पांच लाख रुपये मानसिक क्षतिपूर्ति मुआवजा

याचिकाकर्ता ने दूसरी मर्तबे दायर याचिका में 13 जुलाई 2011 से 31.दिसंबर 2016 तक पदोन्नति वाले पद के वेतन के बकाया राशि का भुगतान, मुकदमेबाजी की लागत और उसे हुई कठिनाई के मुआवजे के रूप में 5 लाख रुपये की मांग की है।

हाई कोर्ट ने अपने आदेश में ये कहा

हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा है, अभिलेखों से प्राप्त निर्विवाद तथ्य यह है कि याचिकाकर्ता को पहले राज्य सरकार के विभागीय अधिकारियों द्वारा बिना किसी कारण के सहायक आयुक्त के पद पर वरिष्ठता से वंचित कर दिया गया था। विभाग द्वारा 01.अप्रैल 2008 को जारी की गई पदक्रम सूची के अवलोकन से यह स्पष्ट है कि याचिकाकर्ता को सहायक आयुक्त के पद पर पदोन्नत किया गया था। राज्य ने याचिकाकर्ता के अभ्यावेदन पर विचार किया और 31.जनवरी 2014 के आदेश द्वारा ‘कोई कार्य नहीं, कोई वेतन नहीं’ के सिद्धांत को लागू करते हुए उन्हें 07.सितंबर 2006 से वरिष्ठता प्रदान की गई।

हाई कोर्ट की तल्ख टिप्पणी

प्रतिवादियों की गलती के कारण याचिकाकर्ता पदोन्नति के लाभ से वंचित रह गया और न्यायालय के हस्तक्षेप के बाद ही अधिकारियों को होश आया। इस प्रकार, याचिकाकर्ता को पदोन्नति के लाभ से वंचित करने में पूरी तरह से राज्य सरकार के विभागयी अधिकारियों ने गलती की है। इसलिए, इस न्यायालय का मत है कि यह एक ऐसा मामला है जहां ‘काम नहीं तो वेतन नहीं’ का सिद्धांत लागू नहीं होता है, बल्कि पदोन्नति से वंचित करना अधिकारियों की गलती के कारण हुआ है।

कोर्ट ने कहा, यदि नियोक्ता द्वारा किसी कर्मचारी को उसके कर्तव्यों का पालन करने से रोका जाता है, तो कर्मचारी को काम न करने के लिए दोषी नहीं ठहराया जा सकता है, और “बिना वेतन के काम नहीं” का सिद्धांत ऐसे कर्मचारी पर लागू नहीं होगा।

कोर्ट ने कहा: अधिकारियों की निष्क्रियता बनी सबसे बड़ी वजह

कोर्ट ने अपने फैसले में कहा है, याचिकाकर्ता राज्य सरकार के अधिकारियों की निष्क्रियता के कारण पदोन्नत पद पर अपने कर्तव्यों का निर्वहन करने से वंचित रहा, फिर भी न्यायालय इस तथ्य को नजरअंदाज नहीं कर सकता कि याचिकाकर्ता ने वास्तव में पदोन्नत पद से संबंधित कर्तव्यों का पालन नहीं किया। अतः, अधिकारियों की चूक और विलंबित कार्रवाई के कारण सार्वजनिक खजाने पर पड़ने वाले बोझ को संतुलित करते हुए, न्यायसंगत राहत की आवश्यकता है। न्यायालय का मत है कि यदि याचिकाकर्ता को 13.जुलाई 2011 से 31.दिसंबर 2016 की अवधि के लिए, यानी उसके कनिष्ठों की पदोन्नति की तिथि से लेकर उसकी सेवानिवृत्ति की तिथि तक, उपायुक्त और सहायक आयुक्त के पदों के बीच वेतन अंतर के बकाया का 50% प्रदान किया जाता है, तो यह न्यायसंगत होगा।

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