सनातन धर्म में मृत्यु के अंतिम क्षणों में व्यक्ति के मुंह में गंगाजल और तुलसी का पत्ता रखना एक अत्यंत पवित्र और अनिवार्य परंपरा मानी गई है। इसके पीछे कई गहरे धार्मिक, आध्यात्मिक और व्यावहारिक कारण छिपे हुए हैं। चलिए जानते हैं कि इस बारे में गरुड़ पुराण में क्या कहा गया है?
मुंह में गंगाजल रखने का महत्व
गंगा नदी को सनातन परंपरा में केवल एक नदी के रूप में नहीं देखा जाता, बल्कि साक्षात ‘मोक्षदायिनी’ (मोक्ष देने वाली) मां माना गया है। ऐसे में मृतक के मुख में गंगाजल डालने से उसके कायिक, वाचिक और मानसिक पाप नष्ट हो जाते हैं। गरुड़ पुराण के अनुसार, यदि मृत्यु के समय किसी के कंठ से गंगाजल नीचे उतरता है, तो उस आत्मा को यमलोक के कष्ट नहीं भोगने पड़ते और वह सीधे मोक्ष (सर्वोच्च गति) को प्राप्त करता है।
इसलिए महत्वपूर्ण है यह विधि
शास्त्रों में माना गया है मृत्यु के समय मुख में तुलसी या गंगाजल डालने का अनुष्ठान जीवात्मा की अगली यात्रा को सुगम, शांतिपूर्ण और पवित्र बनाने के लिए किया जाता है। मृतक के मुख में गंगाजल या तुलसी आदि रखने का मुख्य उद्देश्य व्यक्ति की आत्मा को सांसारिक मोह-माया से मुक्त कर मुक्ति यानी मोक्ष प्रदान करना और शरीर व आत्मा की पवित्रता सुनिश्चित करना है।
यह परंपरा आत्मा की शांति, परलोक यात्रा को सफल बनाने और शरीर को अंत समय में सात्विक ऊर्जा प्रदान करने का एक अंतिम आध्यात्मिक प्रयास भी है। ऐसे में यह कहा जा सकता है, कि यह परंपरा इस बात का प्रतीक है कि इंसान ने चाहे जीवन कैसा भी जिया हो, लेकिन उसका अंत पूरी तरह पवित्र, सात्विक और शांतिपूर्ण होना चाहिए ताकि उसकी आत्मा को सद्गति मिल सके।



