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भोलेनाथ को प्रसन्न करने का सबसे सरल उपाय, जानें शिव चालीसा पाठ की सही विधि

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हिंदू धर्म में सप्ताह का सोमवार का दिन भगवान शिव को समर्पित है। इस दिन भगवान शिव की पूजा करना अत्यंत शुभ और फलदायी होता है। देवों के देव महादेव को प्रसन्न करने के लिए एक लोटा जल और कुछ बेलपत्र ही काफी होता है।  इसके अलावा भोलेनाथ की कृपा पाने के लिए शिव चालीसा का पाठ सबसे सरल और प्रभावशाली माना गया है। सोमवार के दिन इस नियम और विधि के साथ शिव चालीसा का पाठ करवे से भक्तों की हर अधूरी मनोकामना पूरी होती है। शिव चालीसा का पाठ करने से जीवन के बड़े से बड़े संकट दूर हो जाते हैं। आइए जानते हैं शिव चालीसा पढ़ने का सही नियम।

शिव चालीसा पाठ का सही नियम

  • सोमवार के दिन प्रात:काल उठकर स्नान आदि के बाद साफ कपड़े पहन लें। इसके बाद पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके आसन पर बैठें। कभी भी सीधे जमीन पर बैठकर पाठ न करें।
  • इसके बाद भगवान शिव की मूर्ति या तस्वीर के सामने घी का दीया जलाएं और एक तांबे के पात्र में साफ जल भरकर रखें। चालीसा का पाठ पूरा होने के बाद इस जल को पूरे घर में छिड़कें।
  • शिव चालीसा का पाठ करते समय शब्दों का उच्चारण एकदम साफ और स्पष्ट होना चाहिए। पूरा ध्यान शिव जी के चरणों में केंद्रित रखें। पाठ के बीच में किसी से बात न करें और न ही बार-बार उठें।
  • सोमवार को सुबह ब्रह्म मुहूर्त या फिर शाम को प्रदोष काल (सूर्यास्त के समय) में शिव चालीसा का पाठ करना सबसे उत्तम और  फलदायी माना जाता है।

श्री शिव चालीसा

॥ दोहा ॥

जय गणेश गिरिजा सुवन,मंगल मूल सुजान।

कहत अयोध्यादास तुम,देहु अभय वरदान॥

॥ चौपाई ॥

जय गिरिजा पति दीन दयाला।सदा करत सन्तन प्रतिपाला॥

भाल चन्द्रमा सोहत नीके।कानन कुण्डल नागफनी के॥

अंग गौर शिर गंग बहाये।मुण्डमाल तन क्षार लगाए॥

वस्त्र खाल बाघम्बर सोहे।छवि को देखि नाग मन मोहे॥

मैना मातु की हवे दुलारी।बाम अंग सोहत छवि न्यारी॥

कर त्रिशूल सोहत छवि भारी।करत सदा शत्रुन क्षयकारी॥

नन्दि गणेश सोहै तहँ कैसे।सागर मध्य कमल हैं जैसे॥

कार्तिक श्याम और गणराऊ।या छवि को कहि जात न काऊ॥

देवन जबहीं जाय पुकारा।तब ही दुख प्रभु आप निवारा॥

किया उपद्रव तारक भारी।देवन सब मिलि तुमहिं जुहारी॥

तुरत षडानन आप पठायउ।लवनिमेष महँ मारि गिरायउ॥

आप जलंधर असुर संहारा।सुयश तुम्हार विदित संसारा॥

त्रिपुरासुर सन युद्ध मचाई।सबहिं कृपा कर लीन बचाई॥

किया तपहिं भागीरथ भारी।पुरब प्रतिज्ञा तासु पुरारी॥

दानिन महँ तुम सम कोउ नाहीं।सेवक स्तुति करत सदाहीं॥

वेद माहि महिमा तुम गाई।अकथ अनादि भेद नहिं पाई॥

प्रकटी उदधि मंथन में ज्वाला।जरत सुरासुर भए विहाला॥

कीन्ही दया तहं करी सहाई।नीलकण्ठ तब नाम कहाई॥

पूजन रामचन्द्र जब कीन्हा।जीत के लंक विभीषण दीन्हा॥

सहस कमल में हो रहे धारी।कीन्ह परीक्षा तबहिं पुरारी॥

एक कमल प्रभु राखेउ जोई।कमल नयन पूजन चहं सोई॥

कठिन भक्ति देखी प्रभु शंकर।भए प्रसन्न दिए इच्छित वर॥

जय जय जय अनन्त अविनाशी।करत कृपा सब के घटवासी॥

दुष्ट सकल नित मोहि सतावै।भ्रमत रहौं मोहि चैन न आवै॥

त्राहि त्राहि मैं नाथ पुकारो।येहि अवसर मोहि आन उबारो॥

लै त्रिशूल शत्रुन को मारो।संकट ते मोहि आन उबारो॥

मात-पिता भ्राता सब होई।संकट में पूछत नहिं कोई॥

स्वामी एक है आस तुम्हारी।आय हरहु मम संकट भारी॥

धन निर्धन को देत सदा हीं।जो कोई जांचे सो फल पाहीं॥

अस्तुति केहि विधि करैं तुम्हारी।क्षमहु नाथ अब चूक हमारी॥

शंकर हो संकट के नाशन।मंगल कारण विघ्न विनाशन॥

योगी यति मुनि ध्यान लगावैं।शारद नारद शीश नवावैं॥

नमो नमो जय नमः शिवाय।सुर ब्रह्मादिक पार न पाय॥

जो यह पाठ करे मन लाई।ता पर होत है शम्भु सहाई॥

ॠनियां जो कोई हो अधिकारी।पाठ करे सो पावन हारी॥

पुत्र होन कर इच्छा जोई।निश्चय शिव प्रसाद तेहि होई॥

पण्डित त्रयोदशी को लावे।ध्यान पूर्वक होम करावे॥

त्रयोदशी व्रत करै हमेशा।ताके तन नहीं रहै कलेशा॥

धूप दीप नैवेद्य चढ़ावे।शंकर सम्मुख पाठ सुनावे॥

जन्म जन्म के पाप नसावे।अन्त धाम शिवपुर में पावे॥

कहैं अयोध्यादास आस तुम्हारी।जानि सकल दुःख हरहु हमारी॥

॥ दोहा ॥

नित्त नेम उठि प्रातः ही,पाठ करो चालीसा।

तुम मेरी मनोकामना,पूर्ण करो जगदीश॥

मगसिर छठि हेमन्त ॠतु,संवत चौसठ जान।

स्तुति चालीसा शिवहि,पूर्ण कीन कल्याण॥

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