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मासिक दुर्गाष्टमी आज: जानें दुर्गा चालीसा पाठ का सही नियम और इसके चमत्कारी लाभ

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22 जून आज मासिक दुर्गाष्टमी का व्रत रखा जाएगा। हर माह की अष्टमी तिथि का दिन मां दुर्गा को समर्पित है। इस दिन माता रानी की पूजा-अर्चना करने से भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूरी हो जाती हैं। मासिक दुर्गाष्टमी के दिन दुर्गा चालीसा का पाठ भी अवश्य करें। दुर्गा चालीसा का पाठ करने से व्यक्ति को सभी दुखों से शीघ्र छुटकारा मिल जाता है। तो चलिए जानते हैं दुर्गा चालीसा पाठ नियम के बारे में।

दुर्गा चालीसा पाठ करने का सही नियम

  • प्रात:काल उठकर स्नान आदि कर लें और साफ-सुथरे कपड़े पहन लें। लाल या गुलाबी जैसे शुभ रंग के कपड़े ही पहनें।
  • इसके बाद मंदिर या पूजा स्थल को साफ कर गंगाजल छिड़कें।
  • लकड़ी की चौकी रखें और उस पर लाल रंग का कपड़ा बिछा दें।
  • अब चौकी पर मां दुर्गा की मूर्ति या तस्वीर स्थापित करें।
  • मां दुर्गा को फूल, सिंदूर, अक्षत अर्पित करें। धूप-दीप जलाएं और पूजा करें।
  • माता रानी को फल और भोग अर्पित करें।
  • इसके बाद दुर्गा चालीसा का पाठ करें। पाठ पूरा होने के बाद आरती और मंत्रों का जाप करें।

दुर्गा चालीसा पाठ करने के लाभ

  • दुर्गा चालीसा का पाठ करने से व्यक्ति के आत्मविश्वास में वृद्धि होती है और हर कार्य में सफलता मिलती है।
  • दुर्गा चालीसा का पाठ करने से मानसिक तनाव से छुटकारा मिलता है।
  • दुर्गा चालीसा का पाठ करने से घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और आर्थिक समृद्धि बनी रहती है।
  • नियमित रूप से दुर्गा चालीसा का पाठ करने से धन-धान्य में बरकत होती है।
  • दुर्गा चालीसा का पाठ करने से नकारात्मकता दूर होती है। घर-परिवार से बुरी शक्तियां दूर रहती हैं।

श्री दुर्गा चालीसा

॥ चौपाई ॥

नमो नमो दुर्गे सुख करनी।नमो नमो अम्बे दुःख हरनी॥

निराकार है ज्योति तुम्हारी।तिहूँ लोक फैली उजियारी॥

शशि ललाट मुख महाविशाला।नेत्र लाल भृकुटि विकराला॥

रूप मातु को अधिक सुहावे।दरश करत जन अति सुख पावे॥

तुम संसार शक्ति लय कीना।पालन हेतु अन्न धन दीना॥

अन्नपूर्णा हुई जग पाला।तुम ही आदि सुन्दरी बाला॥

प्रलयकाल सब नाशन हारी।तुम गौरी शिवशंकर प्यारी॥

शिव योगी तुम्हरे गुण गावें।ब्रह्मा विष्णु तुम्हें नित ध्यावें॥

रूप सरस्वती को तुम धारा।दे सुबुद्धि ऋषि-मुनिन उबारा॥

धरा रूप नरसिंह को अम्बा।प्रगट भईं फाड़कर खम्बा॥

रक्षा कर प्रह्लाद बचायो।हिरण्याक्ष को स्वर्ग पठायो॥

लक्ष्मी रूप धरो जग माहीं।श्री नारायण अंग समाहीं॥

क्षीरसिन्धु में करत विलासा।दयासिन्धु दीजै मन आसा॥

हिंगलाज में तुम्हीं भवानी।महिमा अमित न जात बखानी॥

मातंगी अरु धूमावति माता।भुवनेश्वरी बगला सुख दाता॥

श्री भैरव तारा जग तारिणी।छिन्न भाल भव दुःख निवारिणी॥

केहरि वाहन सोह भवानी।लांगुर वीर चलत अगवानी॥

कर में खप्पर-खड्ग विराजै।जाको देख काल डर भाजे॥

सोहै अस्त्र और त्रिशूला।जाते उठत शत्रु हिय शूला॥

नगर कोटि में तुम्हीं विराजत।तिहुंलोक में डंका बाजत॥

शुम्भ निशुम्भ दानव तुम मारे।रक्तबीज शंखन संहारे॥

महिषासुर नृप अति अभिमानी।जेहि अघ भार मही अकुलानी॥

रूप कराल कालिका धारा।सेन सहित तुम तिहि संहारा॥

परी गाढ़ सन्तन पर जब-जब।भई सहाय मातु तुम तब तब॥

अमरपुरी अरु बासव लोका।तब महिमा सब रहें अशोका॥

ज्वाला में है ज्योति तुम्हारी।तुम्हें सदा पूजें नर-नारी॥

प्रेम भक्ति से जो यश गावै।दुःख दारिद्र निकट नहिं आवें॥

ध्यावे तुम्हें जो नर मन लाई।जन्म-मरण ताकौ छुटि जाई॥

जोगी सुर मुनि कहत पुकारी।योग न हो बिन शक्ति तुम्हारी॥

शंकर आचारज तप कीनो।काम अरु क्रोध जीति सब लीनो॥

निशिदिन ध्यान धरो शंकर को।काहु काल नहिं सुमिरो तुमको॥

शक्ति रूप को मरम न पायो।शक्ति गई तब मन पछितायो॥

शरणागत हुई कीर्ति बखानी।जय जय जय जगदम्ब भवानी॥

भई प्रसन्न आदि जगदम्बा।दई शक्ति नहिं कीन विलम्बा॥

मोको मातु कष्ट अति घेरो।तुम बिन कौन हरै दुःख मेरो॥

आशा तृष्णा निपट सतावे।मोह मदादिक सब विनशावै॥

शत्रु नाश कीजै महारानी।सुमिरौं इकचित तुम्हें भवानी॥

करो कृपा हे मातु दयाला।ऋद्धि-सिद्धि दे करहु निहाला॥

जब लगि जियउं दया फल पाऊं।तुम्हरो यश मैं सदा सुनाऊं॥

दुर्गा चालीसा जो नित गावै।सब सुख भोग परमपद पावै॥

देवीदास शरण निज जानी।करहु कृपा जगदम्ब भवानी॥

॥ इति श्री दुर्गा चालीसा सम्पूर्ण ॥

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