मनेद्रगढ़। आज की शिक्षित पीढ़ी और उच्च शिक्षा प्राप्त नवयुवकों के मन में जहां हिंदुस्तान से बाहर विदेश में जाकर अपने कैरियर बनाने एवं उच्च की पढ़ाई के लिए ललक रहती है, वहीं मनेद्रगढ़ के डा नीरज श्रीवास्तव चाइना जैसे देश को छोड़कर अपने वतन भारत इसलिए वापस आ गए कि वे अपने पिता की सेवा के साथ आगे की नौकरी कर सके। चाइना जैसे देश में आकर्षक पैकेज में कृषि साइंटिस्ट के रूप में मनेद्रगढ़ के डा नीरज श्रीवास्तव , भारत का प्रतिनिधित्व कर रहे थे। इसी बीच नीरज के पिता सेवानिवृत्त प्राचार्य मुन्नालाल श्रीवास्तव के पैरों की इतनी तकलीफ़ बढ़ गई कि वे सामान्य रूप से चलने फिरने में असमर्थ हो गए। ऐसे संवेदनशील , नाजुक घड़ी में बेटा सात समुंदर पार चीन में नौकरी कर रहा था।
किसी अनहोनी की आशंका से उनके बेटे नीरज ने चीन की वह एग्रीकल्चर साइंटिस्ट की नौकरी छोड़ दी और हिंदुस्तान वापस आ गए । उनकी इच्छा थी कि सेवानिवृत्त के बाद, मेरी पोस्टिंग ऐसी जगह हो जहां मैं अपने दायित्व के निर्वहन करते हुए सहज रूप से तत्काल पिता की सेवा के लिए उपस्थित हो सकूं। होनहार और प्रतिभाशाली डा नीरज ने छत्तीसगढ़ के संत गहिरा गुरु विश्वविद्यालय अंबिकापुर में प्राध्यापक के लिए आवेदन दिया। उनके पिछले अनुभव एवं योग्यता के आधार पर मनेद्रगढ़ के डा नीरज की नियुक्ति छत्तीसगढ़ विश्वविद्यालय अधिनियम के तहत विश्वविद्यालय शिक्षा विभाग में बायोटेक्नोलॉजी विषय में प्राध्यापक अकादमिक लेबल 14 के वेतनमान पर हो गई।
अपने पिता को आदर्श मानने वाले डॉ नीरज श्रीवास्तव की कार्यक्षमता एवं नेतृत्व अनुभव को देखते हुए उन्हें संत गहिरा गुरु विश्वविद्यालय अंबिकापुर में आंतरिक गुणवत्ता एवं आश्वासन प्रकोष्ठ (आइक्यूएसी )के डायरेक्टर के रूप में प्रोफेसर नीरज श्रीवास्तव को दायित्व सौंप दिया गया।
वैश्विक मंच पर भारत का चीन में प्रतिनिधित्व कर चुके प्रोफेसर नीरज श्रीवास्तव इन दिनों बायोटेक्नोलॉजी विषय में प्राध्यापक पद पर कार्य कर रहे हैं, एवं अवकाश के समय अपने पिता सेवानिवृत प्राचार्य मुन्नालाल श्रीवास्तव की सेवा के लिए भी मनेद्रगढ़ आकर एक पुत्र के दायित्व का बखूबी निर्वहन कर रहे हैं। मनेद्रगढ़ में पिता के संस्कार एवं अनुशासन में पले बढ़े एवं उच्च शिक्षा प्राप्त डॉ नीरज श्रीवास्तव ने आज के युवा पीढ़ी के लिए अनुकरणीय उदाहरण एवं आदर्श स्थापित किया है। जिसके सर्वत्र प्रशंसा की जा रही है



