ओडिशा के पुरी स्थित भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा दुनियाभर में प्रसिद्ध है. रथयात्रा का पावन पर्व हर साल आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि के दिन मनाया जाता है. इस दिन भगवान जगन्नाथ अपने बड़े भाई बलबद्र और बहन सुभद्रा जी के साथ नगर भ्रमण पर निकलते हैं और अपनी मौसी गुंडिचा देवी के मंदिर में जाते हैं. इस साल रथयात्रा 16 जुलाई को निकाली जाएगी.हर साल रथयात्रा में लाखों श्रद्धालु शामिल होते हैं रथों की रस्सियों को खींचकर पुण्य प्राप्त करते हैं. रथयात्रा के दौरान भगवान जगन्नाथ अपनी मौसी से मिलने जाते हैं ये बात तो सब जानते हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस यात्रा के दौरान भगवान जगन्नाथ अपनी बुआ कुंती से मिलने के लिए भी जाते हैं? पुरी में माता कुंती का भी एक पौराणिक मंदिर है. इसे ‘पिशि मां की कुटिया’ भी कहा जाता है. मान्यता है कि बिना यहां रुके बिना जगन्नाथ जी की यात्रा पूरी नहीं होती है.
महाभारत की कथा के अनुसार:- ओड़िया भाषा में ‘पिशि’ का अर्थ होता है बुआ. महाभारत की कथा के अनुसार, माता कुंती भगवान श्रीकृष्ण की बुआ थीं. कुंती के पिता राजा शूरसेन और भगवान कृष्ण के पिता वासुदेव सगे भाई थे. रथयात्रा के दौरान भगवान जगन्नाथ अपने बड़े भाई बलभद्र अपनी बहन सुभद्रा जी के साथ पिशी मां की कुटिया में जरूर जाते हैं. माता कुंती के इस मंदिर के चारों ओर एक तालाब है. माना जाता है कि भगवान अपनी बुआ के यहां नौका विहार करते हैं.
इस मंदिर के अंदर देवी कुंती के साथ 5 पांडवों की भी प्रतिमाएं दखने को मिलती हैं. यहां भगवान श्रीकृष्ण की पूजा माता कुंती के साथ की जाती है. भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा जी भी यहां विराजमान हैं. पौराणिक मान्यता के अनुसार, भगवान जगन्नाथ अपनी बुआ से बहुत प्यार करते थे. उन्होंने अपनी बुआ से वादा किया था कि रथयात्रा पर निकलते समय वो उनके घर पर जरूर आएंगे. तभी से ये परंपरा शुरू हो गई.
मंदिर के सामने रोका जाता है भगवान का रथ:- रथयात्रा के दौरान भगवान जगन्नाथ का रथ पिशि मां के मंदिर के सामने कुछ समय के लिए रोका जाता है. जब इस मंदिर में भगवान आते हैं, तो उनको पोडा पीठा का भोग लगाया जाता है. माना जाता है कि जब तक उन्हें पिशि मां की कुटिया में ले जाकर पोडा पीठा का भोग नहीं लगाया जाता है, तब तक भगवान की यात्रा की पूरी नहीं मानी जाती है.



