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सनातन धर्म में हवन-पूजन के बाद माथे पर क्यों लगाई जाती है भस्म? शरीर-मन और आत्मा से जुड़ा है रहस्य…

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जब भी आपके घर में कोई हवन-पूजन होता है तो उसके समापन के बाद हवन कुंड से भस्म लेकर माथे पर लगाते हैं. इस धार्मिक काम के पीछे गहरे रहस्य जुड़े हुए हैं. दरअसल, सनातन धर्म में भस्म लगाना महज एक नियमित काम नहीं है, इसे गहन आध्यात्मिक चिंतन और जीवन शैली का प्रतीक माना जाता है. मंदिरों में जाते समय, पूजा पूरी करने के बाद या घर पर भगवान की आराधना करने के बाद माथे पर भस्म लगाना कई लोगों की दैनिक आदत है.पीढ़ियों से चली आ रही यह परंपरा न केवल ईश्वर के प्रति भक्ति को दर्शाती है, बल्कि मानव जीवन की क्षणभंगुरता को दर्शाने वाला एक आध्यात्मिक प्रतीक भी है. आइए जानते हैं इसके पीछे क्या रहस्य है?

भस्म का अर्थ जलने के बाद बची राख से है. यह हमें याद दिलाती है कि संसार में चाहे कितना भी धन, पद, प्रसिद्धि या शक्ति हो आखिर सब कुछ क्षणभंगुर है. भस्म एक ऐसा प्रतीक है जो इस दर्शन को सरल शब्दों में व्यक्त करता है कि मनुष्य जन्म लेता है, जीवन जीता है और अंत में मिट्टी में मिल जाता है इसलिए यह सादगी से जीवन जीने और अहंकार को त्यागने के विचार पर भी बल देता है.

मन को मिलती है शांति:- मान्यताओं के मुताबिक, माथे पर भस्म लगाना से ईश्वर को हमेशा याद रखने और अच्छे विचारों के साथ जीवन जीने की भावना उत्पन्न होती है. भक्तों का मानना ​​है कि पूजा के दौरान भस्म लगाने से मन एकाग्र होता है. यह अभ्यास दैनिक जीवन की चुनौतियों और तनावों के बीच ईश्वर में आस्था बनाए रखने की इच्छाशक्ति को भी विकसित करता है. इससे आध्यात्मिक जीवन और नैतिक जीवन के बीच एक अच्छा संबंध स्थापित होता है.

माथे पर तीन रेखाओं में लगी भस्म का अर्थ:- शैव परंपरा में, भस्म को आमतौर पर माथे पर तीन क्षैतिज रेखाओं के रूप में धारण किया जाता है. कई आध्यात्मिक विद्वान बताते हैं कि ये तीन रेखाएं मनुष्य के अज्ञान, अहंकार और इच्छाओं को नियंत्रित करने के दर्शन को दर्शाती हैं. यह हमें इस विचार की भी याद दिलाती है कि शरीर, मन और आत्मा तीनों शुद्ध होने चाहिए इसलिए भस्म लगाना न केवल एक बाहरी प्रतीक माना जाता है, बल्कि एक आध्यात्मिक अभ्यास भी है जो आंतरिक चिंतन को विकसित करता है.

कई परिवार आज भी रोज लगाते हैं भस्म:- आज की मॉडर्न लाइफस्टाइल में भी कई परिवारों में भस्म लगाने की प्रथा प्रचलित है. यह केवल एक धार्मिक रीति-रिवाज ही नहीं, बल्कि आध्यात्मिक परंपरा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा भी है. बच्चों को इस प्रथा से परिचित कराकर, आस्था, अनुशासन, विनम्रता और अच्छे जीवन के मूल्यों को पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ाया जाता है. भस्म लगाने की परंपरा हमें निरंतर याद दिलाती है कि आध्यात्मिकता का सच्चा उद्देश्य बाहरी अनुष्ठानों के बजाय आंतरिक पवित्रता को विकसित करना है.

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