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जिसके कारण हम मनाते हैं होली, उसका पाकिस्तान से है कनेक्शन, कैसे ‘इस्लाम की धरती’ से हुआ रंगोत्सव का आगाज

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होली, भारत में दिवाली के बाद सबसे बड़े त्योहारों में से एक है. हिंदू कैलेंंडर के अनुसार फाल्गुन महीने में मनाये जाने वाले इस पर्व का खास महत्व है.

होली का त्योहार भारत के अलावा उन देशों में भी पूरे जोश और उत्साह के साथ मनाया जाता है, जहां भारतीय रहते हैं. लेकिन क्या आप जानते हैं कि पाकिस्तान में एक ऐसी जगह है, जिसका होली के त्योहार से गहरा नाता है. एक जमाना था जब पाकिस्तान में नौ दिन होली होती थी.

इस बार भारत समेत दुनिया के कई देशों में 14 मार्च को होली खेली जाएगी. 13 मार्च को होलिका दहन किया जाएगा और 14 मार्च को रंगोत्सव या धुलेंड़ी होगी. हिंदू धर्म में हर त्योहार के पीछे एक पौराणिक कथा है. होली को लेकर भी एक पौराणिक कहानी है. इसे भी बुराई पर अच्छाई की जीत के तौर पर मनाया जाता है. इस पौराणिक कहानी के तीन पात्र विष्णु भक्त प्रह्लाद, उनके पिता हिरण्यकश्यप और प्रह्लाद की बुआ होलिका हैं. प्रह्लाद के पिता हिरण्‍यकश्‍यप भगवान विष्‍णु को अपना दुश्मन मानते थे. प्रह्लाद भगवान विष्णु की पूजा करता था और हिरण्यकश्यप को यह पसंद नहीं था. इसीलिए हिरण्यकश्यप अपने बेटे प्रह्लाद से नाराज रहते थे.

क्या चाहते थे हिरण्यकश्यप

हिरण्यकश्यप अपने बेटे को भगवान विष्णु की पूजा छोड़ने के लिए मजबूर करना चाहते थे. इसके लिए वे किसी भी हद तक जाने को तैयार रहते थे. लेकिन हर बार भगवान विष्णु ने प्रह्लाद की रक्षा की. हिरण्यकश्यप की बहन होलिका को आग में ना जलने का वरदान मिला हुआ था. उन्‍होंने अपनी बहन को विष्‍णु भक्‍त प्रह्लाद को गोद में लेकर अग्नि में बैठने का आदेश दिया. जब होलिका प्रह्लाद को लेकर अग्नि में बैठीं तो वह खुद जल गईं और भक्‍त प्रह्लाद बच गए. बाद में जब प्रह्लाद को लोहे के गर्म खंभे से बंधवाया तो भगवान विष्‍णु ने नरसिंह अवतार लेकर हिरण्‍यकश्‍यप का वध कर दिया.

पाकिस्तान में हुई थी होलिका वाली घटना

लेकिन इस कथा के पीछे यह हकीकत आप नहीं जानते होंगे कि भक्त प्रह्लाद, हिरण्यकश्यप और होलिका की ये घटना पाकिस्तान में हुई थी. आप ये भी नहीं जानते होंगे कि वो जगह पाकिस्‍तान में कहां है? भक्‍त प्रह्लाद ने जिस जगह पर होलिका दहन हुआ था उसी जगह पर नरसिंह अवतार के सम्‍मान में मंदिर बनाया था. उन्‍होंने हजारों साल पहले जिस जगह मंदिर बनवाया था, वो जगह आज पाकिस्तान में पंजाब प्रांत के मुल्तान शहर में है. इस मंदिर का नाम प्रह्लादपुरी मंदिर है. एक समय तक ये मंदिर अच्छी स्थिति में था. इस मंदिर के बारे में कहा जाता है कि यहीं पर प्रह्लाद की बुआ होलिका आग में भस्म हो गई थीं. लोककथाओं के अनुसार यह वही जगह है, जिसे होली उत्सव की उत्पत्ति से जोड़ा जाता है.

9 दिन चलता था होली का उत्सव

पौराणिक मान्यता है कि जहां आज प्रह्लादपुरी मंदिर है, वहीं पर हिरण्यकश्यप ने प्रहलाद को खंभे से भी बांधा था. यही पर भगवान नरसिंह ने खंभे से प्रकट होकर हिरण्‍यकश्‍यप का भी वध किया था. हजारों साल पुराने प्रह्लादपुरी मंदिर के जीर्णोद्धार के लिए साल 1861 में लोगों ने चंदा भी इकट्ठा किया था. साल 1947 में बंटवारे के समय प्रह्लादपुरी मंदिर पाकिस्तान के हिस्से में चला गया. इसके बाद भी होली पर यहां भक्तों की भारी भीड़ जुटती थी. यहां पर दो दिन तक होलिका दहन किया जाता था. इसके बाद 9 दिन तक होली मेला और रंगोत्‍सव मनाया जाता था.

जर्जर हालत में है मंदिर

इस मंदिर का खराब समय तब शुरू हुआ जब भारत में मुसलमानों के धार्मिक स्थानों को लेकर कट्टरपंथियों ने संकीर्ण रुख अपनाना शुरू किया. साल 1992 में जब अयोध्‍या में विवादित ढांचा ढहाया गया तो मुल्‍तान में कुछ मुस्लिम कट्टरपंथियों ने प्रह्लादपुरी मंदिर तोड़ दिया. इसके बाद पंजाब सरकार ने भी इसकी देखभाल नहीं की. हालांकि कुछ साल पहले पाकिस्तान की एक अदालत ने मंदिर की मरम्‍मत का आदेश दिया था. हालांकि, अब तक इसे ठीक नहीं किया गया है. वर्तमान में यह मंदिर जर्जर स्थिति में है, अखिल पाकिस्तान हिंदू अधिकार आंदोलन के अध्यक्ष, हारून सरब दियाल ने इस बात पर अफसोस जताया कि देश के प्राचीन मंदिरों की स्थिति बेहद खराब है. इसके अलावा, हिंदुओं को अपने ही पूजा स्थलों में प्रवेश के लिए अधिकारियों से अनुमति लेनी पड़ती है, जो उनके धार्मिक अधिकारों का सीधा उल्लंघन है.

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