कोरबा. छत्तीसगढ़ में माताओं द्वारा संतान की लंबी आयु और सुख-समृद्धि की कामना के साथ मनाए जाने वाले पारंपरिक त्योहार कमरछठ (हलषष्ठी) की तैयारियां पूरी हो चुकी हैं. यह पर्व 14 अगस्त को पूरे श्रद्धाभाव के साथ मनाया जाएगा. जिस प्रकार यूपी-बिहार में संतान की लंबी आयु के लिए सूर्य आराधना का महापर्व छठ पूजा की जाती है, उसी प्रकार छत्तीसगढ़ में भी माताएं अपने बच्चों के दीर्घायु जीवन के लिए कमरछठ का व्रत रखती हैं. इस पवित्र पर्व के लिए शहर के कोसाबाड़ी, निहारिका, घंटाघर, बुधवारी और पुराना शहर कोरबा जैसे प्रमुख इलाकों में स्थानीय लोगों द्वारा पूजन सामग्री की दुकानें लगाई गई हैं. इन दुकानों पर सुबह से ही व्रतियों की भीड़ उमड़ रही है, जो पूजा अनुष्ठान में लगने वाली विभिन्न सामग्रियों की खरीदारी कर रही हैं. पूजा के लिए ‘पसहर चावल’ की विशेष मांग रहती है, जो बिना हल चले निकले धान से तैयार होता है. यह चावल बाजार में लगभग 120 रुपये प्रति किलोग्राम की दर से बिक रहा है.
त्योहार को मनाने की पौराणिक मान्यता
इस पवित्र व्रत में 6 प्रकार की भाजियां, बिना हल चले निकले धान के चावल (पसहर चावल), कासी के फूल, महुए के पत्ते, धान की लाई (लावा), भैंस का दूध, दही और घी जैसी सामग्रियों का विशेष महत्व होता है. इन सभी वस्तुओं को हलषष्ठी माता को अर्पित कर संतान के दीर्घायु और स्वस्थ जीवन की कामना की जाती है. इस त्योहार को मनाने के पीछे एक पौराणिक मान्यता भी है. माना जाता है कि जब कंस ने देवकी के 7 बच्चों का वध कर दिया था, तब देवकी ने हलषष्ठी माता का यह व्रत रखा था, जिसके फलस्वरूप भगवान श्रीकृष्ण का जन्म हुआ. तभी से इस व्रत को मनाने का चलन शुरू हुआ, जिससे संतान प्राप्ति और उनके दीर्घायु जीवन की कामना की जाती है.



