
भारत में सोना और चांदी सिर्फ आभूषण नहीं, बल्कि निवेश का भरोसेमंद जरिया भी माने जाते हैं. लेकिन इनमें निवेश करते समय जितना ध्यान कीमतों पर दिया जाता है, उतना ही जरूरी टैक्स नियमों को समझना भी है. टैक्स एक्सपर्ट्स के मुताबिक, सोना-चांदी पर लगने वाला टैक्स मुख्य रूप से दो बातों पर निर्भर करता है. निवेश का प्रकार और होल्डिंग पीरियड. अगर सही समय पर निवेश को रिडीम नहीं किया गया, तो निवेशक को हजारों रुपये अतिरिक्त टैक्स के रूप में चुकाने पड़ सकते हैं.
ज्वेलरी खरीदना पड़ता है महंगा:- फिजिकल गोल्ड, सिल्वर या डिजिटल गोल्ड खरीदने पर 3% GST देना होता है. अगर ज्वेलरी खरीदी जाती है तो मेकिंग चार्ज पर अलग से 5% GST भी लगता है. हालांकि, यह GST बाद में कैपिटल गेन टैक्स से एडजस्ट नहीं किया जा सकता. जब निवेशक सोना या चांदी बेचता है, तब उस पर कैपिटल गेन टैक्स लागू होता है. अगर आपने सोना-चांदी को 24 महीने से ज्यादा समय तक होल्ड किया है तो इसे लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन माना जाएगा और इस पर 12.5% टैक्स लगेगा. वहीं, 24 महीने से कम समय पर बेचने पर शॉर्ट टर्म कैपिटल गेन माना जाएगा और टैक्स आपकी इनकम टैक्स स्लैब के अनुसार लगेगा.
टैक्स बचाने के हैं ये नियम:- राहत की बात यह है कि टैक्स बचाने के विकल्प भी मौजूद हैं. अगर सोना या चांदी बेचने से लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन होता है, तो इनकम टैक्स एक्ट की धारा 54F के तहत उस रकम को रेजिडेंशियल प्रॉपर्टी में निवेश करके टैक्स में छूट ली जा सकती है. कुल मिलाकर, विशेषज्ञों का मानना है कि सोना-चांदी में निवेश से पहले टैक्स नियमों की सही जानकारी और टाइमिंग की समझ बेहद जरूरी है, ताकि मुनाफा हाथ में रहे और टैक्स का बोझ कम किया जा सके.



