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2 किलो बीज… 20 टन फलन ! गर्मी इस सब्जी की करें खेती और सिर्फ 2 महीने में हो जाए मालामाल

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अमरेली जिले में सब्जी की फसलों में तोरई की खेती किसानों के लिए आय का अच्छा स्रोत बन रही है. एक हेक्टेयर में 20 से 25 टन उत्पादन प्राप्त कर, किसान तोरई के अच्छे दामों से खुश हैं. इस सफलता के चलते, किसान अब गर्मियों में भी तोरई की खेती करने की तैयारी कर रहे हैं.

आहार में सब्जियों का महत्व बहुत अधिक है. लौकी, खीरा, करेला, तोरई, तुरई, तरबूज, शकरकंद, कद्दू और टिंडा जैसी सब्जियां कुकुरबिटेसी परिवार में आती हैं. इन सब्जियों को उगाना आसान और कम खर्चीला होता है, साथ ही अन्य फसलों की तुलना में 5 से 8 गुना अधिक उत्पादन देती हैं.

गौरतलब है कि ये सब्जियां पोषक तत्वों से भरपूर होती हैं, इसलिए आहार में इनका बहुत महत्व है. इनका उपयोग सलाद, सब्जी, अचार और फल के रूप में भी किया जा सकता है.

गर्मियों में सब्जियों की खेती कैसे करें, इस पर कृषि अधिकारी भावेशभाई पीपलिया ने मार्गदर्शन दिया. उन्होंने बताया कि किसान मित्र गर्मियों के दौरान खीरा, करेला, तोरई, तुरई, तरबूज, शकरकंद और कद्दू जैसी सब्जियां उगा सकते हैं.

बता दें कि इन सब्जियों के लिए उपजाऊ और अच्छी जल निकासी वाली जमीन उत्तम रहती है. गोराडू, बसर, मध्यम काली और नदी किनारे की रेतीली जमीन भी बहुत अनुकूल मानी जाती है. जमीन का पीएच 6-7.5 होना जरूरी है.

तोरई की गर्मियों की बुवाई जनवरी के अंत से फरवरी के दौरान की जाती है. बुवाई के समय पौधों के बीच 1.5 मीटर और कतारों के बीच 1.0 मीटर की दूरी बनाए रखना जरूरी है. ऐसा करने से और प्रति हेक्टेयर 2 किलो से 2.5 किलो बीज बोने से 20 से 25 टन तक उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है.

पुसा, प्रिया और अरपोज़ित जैसी किस्में बुवाई के लिए शानदार मानी जाती है. बीज को 22 से 24 घंटे पानी में भिगोकर रखने से उनके अंकुरण में सुधार होता है. रोपाई से पहले, जैविक या रासायनिक फफूंदनाशक का उपयोग करने से बीज को जमीनजन्य रोगों से सुरक्षा मिलती है.

निचले इलाके में पानी भरने से सब्जी की फसल को नुकसान हो सकता है क्योंकि इससे सड़न लग सकती है. इसके विपरीत, ढलान वाली जमीन से पानी आसानी से निकल जाता है, जो सब्जियों के विकास के लिए फायदेमंद है. बेल वाली सब्जियों को गर्म और नम वातावरण पसंद आता है, जैसे 25-30 डिग्री सेल्सियस तापमान. हालांकि, फूल आने के दौरान बादल छाए रहने से फूलों के विकास और फलों की गुणवत्ता पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है.

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