राज्यसभा के उपसभापति पद के चुनाव को लेकर सियासी माहौल गरमा गया है. विपक्ष ने साफ कर दिया है कि वह इस चुनाव का बहिष्कार करेगा. कांग्रेस के वरिष्ठ नेता जयराम रमेश ने गुरुवार को यह ऐलान करते हुए केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार पर गंभीर आरोप लगाए.
जयराम रमेश ने कहा कि बीते सात सालों से लोकसभा में उपाध्यक्ष (डिप्टी स्पीकर) की नियुक्ति नहीं की गई है, जो संसदीय परंपराओं के खिलाफ है. उन्होंने इसे अभूतपूर्व स्थिति बताते हुए कहा कि ऐसा पहले कभी नहीं हुआ. उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि सरकार ने इस मुद्दे पर विपक्ष के साथ कोई सार्थक बातचीत नहीं की.
जयराम रमेश के मुताबिक, संवाद की कमी और संवैधानिक पदों को लेकर सरकार के रवैये के विरोध में ही विपक्ष ने यह कदम उठाया है. रमेश ने अपने बयान में राज्यसभा के मौजूदा उपसभापति हरिवंश का भी जिक्र किया. उन्होंने बताया कि हरिवंश का दूसरा कार्यकाल 9 अप्रैल को समाप्त हो गया था. इसके अगले ही दिन उन्हें राष्ट्रपति द्वारा फिर से राज्यसभा के लिए नामित किया गया और अब वे एनडीए की ओर से तीसरी बार उपसभापति पद के उम्मीदवार हैं. हालांकि, विपक्ष को उम्मीद है कि “हरिवंश 3.0” पहले के मुकाबले ज्यादा सहयोगी और उनकी मांगों के प्रति संवेदनशील रुख अपनाएंगे.
उपसभापति को लेकर गरमाई सियासत
राज्यसभा के उपसभापति पद को लेकर सियासत गरमा गई है. कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने इस मुद्दे पर केंद्र सरकार और सत्तारूढ़ गठबंधन पर गंभीर सवाल उठाए हैं. रमेश ने कहा कि यह पहली बार हो रहा है जब राष्ट्रपति द्वारा राज्यसभा के लिए नामित किसी सदस्य को उपसभापति पद के लिए विचार किया जा रहा है. उन्होंने इसे परंपराओं से हटकर कदम बताया. उन्होंने आगे आरोप लगाया कि इस पूरे मामले में विपक्ष से कोई सार्थक बातचीत नहीं की गई. उनके मुताबिक, इतने महत्वपूर्ण पद के चुनाव से पहले आम सहमति बनाने की कोशिश होनी चाहिए थी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ.
विपक्षी दलों ने जताई आपत्ति
राज्यसभा के उपसभापति का पद 9 अप्रैल को खाली हो गया, जब हरिवंश का कार्यकाल समाप्त हो गया. इसके बाद राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने उन्हें दोबारा राज्यसभा के लिए नामित किया और उन्होंने 10 अप्रैल को शपथ भी ले ली. इस बीच, केंद्रीय मंत्री और बीजेपी के वरिष्ठ नेता जेपी नड्डा, जो राज्यसभा में सदन के नेता भी हैं, ने हरिवंश को फिर से उपसभापति बनाने के लिए विभिन्न दलों के नेताओं से बातचीत की. उनकी कोशिश रही कि इस मुद्दे पर व्यापक सहमति बनाई जा सके. हालांकि, इस पहल पर विपक्षी दलों, कांग्रेस, टीएमसी और वाम दलों ने आपत्ति जताई. उनका कहना है कि सरकार उपसभापति के पद के लिए चुनाव कराने में तो जल्दी दिखा रही है, लेकिन लोकसभा में उपाध्यक्ष का पद 2019 से खाली पड़ा है, जिसे भरने के लिए कोई पहल नहीं की जा रही है.



