भारतीय वायुसेना की ताकत में जल्द ही एक अभूतपूर्व इजाफा होने जा रहा है. अमेरिका और भारत के बीच फाइटर जेट इंजनों के स्वदेशी निर्माण को लेकर एक बड़ा ब्रेकथ्रू हासिल हुआ है. दिग्गज अमेरिकी कंपनी जीई एयरोस्पेस (GE Aerospace) और भारत की हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) के बीच तकनीकी मामलों पर अंतिम सहमति बन गई है. यह केवल एक रक्षा सौदा मात्र नहीं है, बल्कि तकनीक के क्षेत्र में भारत की एक बड़ी छलांग है, जिसका सीधा असर देश की रक्षा क्षेत्र की अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा.
भारत बनेगा आत्मनिर्भर:-इस पूरे रक्षा सौदे में सबसे जटिल हिस्सा टेक्नोलॉजी ट्रांसफर (तकनीक का हस्तांतरण) का था. जीई एयरोस्पेस की वाइस प्रेसिडेंट रीता फ्लेहर्टी ने स्पष्ट किया है कि दोनों देशों के बीच तकनीकी चर्चा का यह ‘सबसे मुश्किल’ दौर अब सफलतापूर्वक पूरा हो चुका है. इस समझौते के तहत, जीई एयरोस्पेस अपने सबसे उन्नत F414 इंजनों की डीप-मैन्युफैक्चरिंग तकनीक भारत को सौंपेगा.आज के समय में दुनिया भर में गिने-चुने देश और कंपनियां ही इस स्तर की हाई-टेक मशीनरी बनाने में सक्षम हैं. कंपनी के पास इस इंजन के 80 प्रतिशत से ज्यादा बौद्धिक संपदा अधिकार (IPR) हैं. यह टेक्नोलॉजी भारत के पास आने का मतलब है कि हम अपनी वायुसेना की रीढ़ माने जाने वाले जेट इंजनों के लिए भविष्य में विदेशी ताकतों पर निर्भर नहीं रहेंगे.
वायुसेना को मिलेगी नई ‘संजीवनी’:- भारतीय वायुसेना इस वक्त अपने लड़ाकू विमानों के स्क्वाड्रन की कम होती संख्या जैसी गंभीर चुनौती से जूझ रही है. ऐसे में इस समझौते के बाद अत्याधुनिक इंजनों का घरेलू उत्पादन तेज होगा, जिससे वायुसेना के बेड़े में नए और शक्तिशाली लड़ाकू विमानों की संख्या तेजी से बढ़ेगी.
99 इंजनों का बड़ा टारगेट:- तकनीकी सहमति के बाद, अब दोनों विमानन कंपनियां इसके कमर्शियल पहलुओं (कीमतों और लागत) पर बातचीत के अगले चरण में प्रवेश करेंगी. चूंकि हाल के महीनों में वैश्विक स्तर पर पुर्जों की कीमतों में काफी उछाल आया है, इसलिए इस प्रक्रिया में थोड़ा वक्त लग सकता है. हालांकि, माना जा रहा है कि इसी वित्त वर्ष में अंतिम कॉन्ट्रैक्ट पर हस्ताक्षर कर दिए जाएंगे.
सुपर-जेट्स बनाने की तैयारी:- इस व्यापक सौदे में केवल नए इंजनों का निर्माण ही शामिल नहीं है, बल्कि मौजूदा विमानों के रखरखाव का भी पुख्ता इंतजाम किया गया है. वायुसेना के वर्तमान बेड़े (खासकर तेजस) को ताकत देने वाले पुराने F404 इंजनों के रखरखाव के लिए जीई ने भारतीय वायुसेना के साथ एक डिपो सुविधा स्थापित करने का कॉन्ट्रैक्ट भी साइन किया है.इस डिपो का पूरा मालिकाना हक और संचालन वायुसेना के पास होगा. जीई इसमें तकनीकी मदद, कलपुर्जे और कर्मचारियों को ट्रेनिंग मुहैया कराएगी. इन सबसे इतर, भारत और अमेरिका भविष्य के फाइटर जेट्स के लिए 120kN क्लास के और भी अधिक शक्तिशाली इंजन विकसित करने पर लगातार चर्चा कर रहे हैं, जो भारतीय एविएशन सेक्टर की पूरी तस्वीर बदल सकता है.



