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जगन्नाथ जी की मूर्ति का रहस्य: बड़ी आंखें, बिना पलकें और अनोखे स्वरूप का धार्मिक महत्व

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जगन्नाथ रथ यात्रा के रहस्यों के साथ उनकी मूर्ति से जुड़े भी कई रहस्य हैं जिनके बारे में दुनिया जानना चाहती है। ऐसा ही एक रहस्य जगन्नाथ जी की मूर्ति की बड़ी आंखों का भी है। भक्तों के लिए भगवान जगन्नाथ की बड़ी-बड़ी आंखें उनके सर्वज्ञ और सर्वव्यापी यानी कि हर जगह मौजूद होने का प्रतीक मानी जाती हैं।कई प्राचीन ग्रंथों और शास्त्रों में इस बात का जिक्र है कि आंखों को आत्मा का द्वार माना जाता है और इसी वजह से जगन्नाथ भगवान की बड़ी आंखें भी उनकी दिव्य दृष्ट और ज्ञान का प्रतीक हैं। उनकी बड़ी आंखें इस बात की सूचक हैं कि जगन्नाथ जी की दृष्टि सदैव भक्तों पर बनी रहती है। इसके साथ ही भगवान जगन्नाथ को चक्का नैन भी कहा जाता है। आइए जानें जगन्नाथ भगवान की बड़ी आंखों का रहस्य और उनका नाम चक्का नैन क्यों पड़ा?

भगवान जगन्नाथ की बड़ी आंखों का रहस्य
भगवान जगन्नाथ की बड़ी आंखों का सबसे बड़ा रहस्य यह है कि उनकी आंखों में पलकें नहीं हैं और सिर्फ आंखें दिव्या दृष्टि को दिखाती हैं। इनकी आंखों में पलकें न होने का एक कारण यह बताया जाता है कि जगन्नाथ भगवान बिना पलकें झुकाए हुए भक्तों को एकटक निहारते रहते हैं और अपने भक्तों की हर कष्ट से रक्षा करते हैं। इस प्रकार पूरे ब्रह्माण्ड में उनकी कृपा दृष्टि बनी रहती है। इसके साथ भी भगवान जगन्नाथ ‘जग के नाथ’ हैं और उनकी बड़ी-बड़ी गोल आंखें यह दिखाती हैं कि वो हर समय, हर स्थान पर मौजूद हैं और इस सृष्टि के कण-कण के साक्षी भी हैं। प्रभु अपने भक्तों को कभी अकेला नहीं छोड़ते हैं और हमेशा उनकी रक्षा के लिए तत्पर रहते हैं।

भगवान जगन्नाथ को ‘चक्का नैन’ क्यों कहा जाता है?
भगवान जगन्नाथ को चक्का नैन कहने के पीछे एक कारण या है कि ‘चक्का’ का शाब्दिक अर्थ होता है गोल चक्र जैसा और नैन का अर्थ होता है आंखें। ऐसे में जगन्नाथ भगवान की आंखें चक्र के समान गोल होने की वजह से उन्हें चक्का नैन कहकर पुकारा जाता है। जगन्नाथ के इस अनोखे स्वरूप का वर्णन स्कंद पुराण में भी किया गया है और एक पौराणिक कथा के अनुसार एक बार एक बार द्वारका नगरी में रुक्मणी आदि रानियों ने माता रोहिणी से प्रार्थना की कि वे श्री कृष्ण व गोपियों की बचपन वाली प्रेम लीलाएं सुनना चाहती हैं। पहले तो माता रोहिणी ने अपने पुत्र की अंतरंग लीलाओं को सुनाने से मना कर दिया। किंतु रानियों के बार-बार आग्रह करने पर मैया मान गई और उन्होंने सुभद्रा जी को महल के बाहर पहरे पर खड़ा कर दिया और बाल लीलाएं सुनाने लगीं। उसी समय श्री कृष्ण और बलराम जी वहां आ पहुंचे। अपनी बाल लीलाएं सुनकर कृष्ण जी को स्मरण हो गया कि कैसे गोपियां अपनी प्रिया व प्रियतम को थोड़ा सा सुख देने के लिए ही अपने बड़े से बड़े सुख को त्याग देती थीं। बाल लीलाओं को याद करके जगन्नाथ भगवान अचंभित हो उठे और उनकी आंखें भाव विभोर होकर बड़ी होने लगीं। उसी समय से उनका नाम चक्का नैन रखा गया।

कैसा है जगन्नाथ जी की मूर्ति का स्वरूप
जगन्नाथ जी की मूर्ति लकड़ी के एक तराशे और सजाए गए टुकड़े से बनी है, जिसमें बड़ी गोल आंखें और एक जैसा दिखने वाला चेहरा है। इस मूर्ति में हाथ या पैर नहीं हैं। जगन्नाथ की पूजा-पद्धति, संस्कार और रीति-रिवाज कई परंपराओं का मिश्रण हैं और इनमें ऐसे अनुष्ठान भी शामिल हैं जो आम तौर पर हिंदू धर्म में नहीं देखे जाते हैं।

खास बात यह है कि यह मूर्ति लकड़ी की बनी होती है और इसे समय-समय पर नई मूर्ति से बदल दिया जाता है। भारत के पूर्वी राज्यों में हर साल जून या जुलाई में मनाया जाने वाला रथ यात्रा का त्योहार जगन्नाथ जी को समर्पित है। रथ यात्रा के दौरान उनकी मूर्ति को, उनसे जुड़े अन्य दो देवी-देवताओं की मूर्तियों के साथ, पुरी में स्थित उनके मुख्य मंदिर के गर्भगृह से पूरे विधि-विधान के साथ बाहर लाया जाता है। वास्तव में जगन्नाथ जी का स्वरूप निराला है और उनकी आंखें गोल और बड़ी होने की वजह से भक्तों के बीच मुख्य आकर्षण का केंद्र बनी रहती हैं।

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