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मां पार्वती ने लिया 108 बार जन्म, अंतिम जन्म में बनीं भगवान शिव की अर्धांगिनी….

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हर साल फाल्गुन माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि के दिन महाशिवरात्रि का पावन पर्व मनाया जाता है. इस साल महाशिवरात्रि का ये पावन पर्व 15 फरवरी को मनाया जाएगा. ये पर्व भगवान शिव और माता पार्वती को समर्पित किया गया है. ये पर्व भगवान शिव का सबसे बड़ा पर्व माना जाता है. पौराणिक कथाओं के अनुसार, वो दिन फाल्गुन माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि का ही था, जब भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह हुआ था. महाशिवरात्रि के दिन भगवान शिव और माता पार्वती की विशेष पूजा-अर्चना और व्रत किया जाता है. इस दिन पूजन और व्रत विशेष फलदायी माना गया है. इस दिन जो भी व्रत और पूजन करता है उस पर भगवान शिव और माता पार्वती की कृपा हमेशा बनी रहती है. फाल्गुन माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी पर शिव और शक्ति का मिलन हुआ था, लेकिन क्या आप जानते हैं इस विवाह के लिए देवी पार्वती ने 108 बार जन्म लिया था? आइए जानते हैं ये अद्भुत कथा.

कथा के अनुसार:- पुराणों में वर्णित कथा के अनुसार, माता पार्वती जी ने शिव जी की अर्धांगिनी बनने के लिए 108 बार जन्म लिया. वो 108वीं बार में पार्वती जी बनकर धरती पर आईं. पार्वती जी के स्वरूप से पहले वो प्रजापति दक्ष के यहां कन्या के रूप में जन्मी थीं. उस जन्म में भी उन्होंने प्रेम से वशीभूत होकर शिव संग प्रेम विवाह किया था. हालांकि, उनके पिता की ये इच्छा थी कि माता पार्वती का विवाह भगवान श्रीहरि विष्णु से हो, लेकिन पार्वती जी ने इस विवाह से मना कर दिया और कहा कि उनका वास्तविक सुख तो महादेव में निहित है. उन्होंने अपनी भक्ति और दृढ़ता से शिव जी को पति के रूप में पाया. इसी बात से प्रजापति दक्ष शिव जी के विरोधी बन गए और उनको अपना सबसे बड़ा शत्रु मान लिया.

माता पार्वती ने त्याग दिए प्राण:- शिव जी को तुच्छ दर्शाने के लिए दक्ष ने एक महायज्ञ आयोजित किया. इसमें उन्होंने सबको बुलाया, लेकिन अपनी बेटी और दामाद को छोड़ दिया. हालांकि, पार्वती जी बिन बुलाए भी वहां पहुंची. इसके बाद उनको शिव जी का अपमान सहना पड़ा. पति के अपमान से आहत होकर उन्होंने यज्ञ के अग्निकुण्ड में कूदकर अपने प्राण त्याग दिए. शिव जी को जब ये पता चला तो उन्होंने क्रोध में अपने बालों से वीरभद्र को प्रकट किया और उनसे दक्ष का सिर कटवा दिया प्रजापति दक्ष का सिर काटवा दिया. इसके बाद वर्षों वर्ष शिव जी का वियोग कम नहीं हुआ. वो संसार से विरक्त हो गए. इधर माता पार्वती ने पर्वतराज हिमालय के घर जन्म लिया. ये उनका 108वां जन्म था. नारद जी ने किशोरी पार्वती जी को शिव को पति रूप में पाने के लिए तपस्या का मार्ग बताया. तब पार्वती जी जंगल में चलीं गईं और सबकुछ त्यागकर कठोर तप शुरू कर दिया. अंत में पार्वती जी के तप से शिव प्रसन्न हो गए और फिर फाल्गुन माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि के दिन दोनों का विवाह हुआ.

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